
पटना।
बिहार के जुझारू नेता कर्पूरी ठाकुर की आज जयंती है। 24 जनवरी 1924 को जन्मे और 17 फरवरी 1988 को निधन होने वाले कर्पूरी ठाकुर ने विपरीत परिस्थितियों में दो बार मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। उनकी सरकारें राजनीतिक गुटबाजी और आरक्षण विरोधी आंदोलन की आग में झुलस गईं।
पहली बार 1970 में बनी कर्पूरी सरकार
कर्पूरी ठाकुर पहली बार दिसंबर 1970 में मुख्यमंत्री बने। इस दौरान उन्हें भोला पासवान शास्त्री की चुनौती झेलनी पड़ी। कांग्रेस के इंदिरा गुट का समर्थन लेने वाले शास्त्री मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक थे, लेकिन राज्यपाल ने कर्पूरी ठाकुर को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया। संसोपा और घटक दलों के सहयोग से उन्होंने 52 सदस्यीय मंत्रिमंडल बनाया। हालांकि, पार्टी की गुटबाजी और गठबंधन की मजबूरियों के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।
1977 में जनता पार्टी से दूसरी बार बने मुख्यमंत्री
1977 में जनता पार्टी के गठन के बाद, कर्पूरी ठाकुर समस्तीपुर लोकसभा से सांसद चुने गए। बिहार में कांग्रेस के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति शासन लगा। जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव में 214 सीटें जीतकर बहुमत प्राप्त किया। विधायक दल का नेता चुनने के लिए वोटिंग में कर्पूरी ठाकुर ने अपने ही पार्टी अध्यक्ष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा को हराकर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
आरक्षण लागू कर कर्पूरी सरकार को संकट
कर्पूरी ठाकुर ने सरकारी नौकरी में 26 फीसदी आरक्षण लागू किया (20% पिछड़ा वर्ग, 3% महिला और 3% ऊंची जाति के गरीब)। इस फैसले के खिलाफ बिहार और केंद्र में विरोध शुरू हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने भी सार्वजनिक रूप से आरक्षण लागू करने का विरोध किया। इसके परिणामस्वरूप जनता पार्टी में गुटबाजी बढ़ी और असंतुष्ट विधायकों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। 19 अप्रैल 1979 को विश्वास मत में हार के बाद कर्पूरी ठाकुर ने इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह रामसुंदर दास मुख्यमंत्री बने।
कर्पूरी ठाकुर का जीवन बिहार की राजनीति में पिछड़े वर्ग के अधिकारों और सामाजिक न्याय के संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। उनके साहस और दृष्टिकोण को आज भी लोग याद करते हैं।