Wednesday, January 21

कानपुर–सागर हाईवे पर जाम बना काल, एंबुलेंस फंसी; गर्भ में ही नवजात की मौत 26 घंटे लंबे जाम ने ली मासूम की जान, प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल

हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर–हमीरपुर–सागर हाईवे पर लगा भीषण जाम एक गर्भवती महिला और उसके परिवार के लिए त्रासदी बन गया। जाम में करीब पांच घंटे तक फंसी एंबुलेंस के कारण प्रसव पीड़ा से जूझ रही महिला के गर्भ में ही नवजात की मौत हो गई। इस घटना के बाद परिजनों में कोहराम मच गया, वहीं प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

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घटना 20 जनवरी की है। जानकारी के अनुसार, बेतवा पुल पर 19 जनवरी की सुबह एक खाली डंपर खराब हो गया था। इसके कुछ ही देर बाद मौरंग से भरा एक ट्रक भी वहीं खराब हो गया, जिससे हाईवे पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया। देखते ही देखते जाम ने विकराल रूप ले लिया और यह स्थिति करीब 26 घंटे तक बनी रही।

 

पुलिस ने मौके पर पहुंचकर ट्रक से मौरंग हटवाने के लिए उसे बेतवा नदी में फिंकवाया और बाद में क्रेन की मदद से ट्रक को हटाया गया। हालांकि, रात होने के कारण कई वाहन चालकों ने सड़क पर ही गाड़ियां खड़ी कर दीं और सो गए, जिससे जाम और अधिक गंभीर हो गया। अगले दिन 20 जनवरी की सुबह करीब 11 बजे कहीं जाकर जाम खुल सका, लेकिन वाहनों की अधिकता के कारण पूरा दिन ट्रैफिक रेंगता रहा।

 

पांच घंटे जाम में फंसी एंबुलेंस

इसी जाम के बीच मौदहा क्षेत्र के पाटनपुर गांव निवासी रीना को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजन उसे मौदहा के सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने हालत गंभीर बताते हुए रात करीब दो बजे जिला अस्पताल रेफर कर दिया। एंबुलेंस रीना को लेकर निकली, लेकिन कस्बा सुमेरपुर के पास जाम में फंस गई। एंबुलेंस करीब पांच घंटे तक वहीं खड़ी रही।

 

जब एंबुलेंस जिला अस्पताल पहुंची तो डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि गर्भ में ही बच्चे की मौत हो चुकी है। यह सुनते ही परिजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

 

परिजनों का दर्द छलका

रीना की सास कौशिल्या ने बताया कि यदि समय पर एंबुलेंस अस्पताल पहुंच जाती, तो शायद बच्चे की जान बच सकती थी। उन्होंने कहा कि जाम के कारण बहू तड़पती रही और आखिरकार पेट में ही बच्चे की मौत हो गई।

 

प्रशासन की सफाई

इस मामले में यातायात प्रभारी हरवेंद्र सिंह ने बताया कि मौरंग से भरे ट्रक के खराब होने के कारण जाम की स्थिति बनी। वाहनों की संख्या अधिक होने से समस्या और बढ़ गई थी।

 

यह घटना न सिर्फ एक परिवार की पीड़ा है, बल्कि आपात सेवाओं की तैयारियों और यातायात प्रबंधन की गंभीर खामियों को भी उजागर करती है। सवाल यह है कि क्या समय रहते बेहतर व्यवस्था होती, तो एक मासूम की जान बचाई जा सकती थी?

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