
नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026 – सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल अपशब्दों का प्रयोग अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता। यह कानून तब लागू होगा जब अपशब्दों में जातिगत नाम का प्रयोग किया गया हो और उसका इरादा अपमानजनक हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपों से स्पष्ट होना चाहिए कि अपशब्द जातिगत नाम के साथ बोले गए थे या जाति के प्रति अपमानजनक थे। यदि ऐसा इरादा मौजूद नहीं है, तो केवल गाली-गलौच को अपराध नहीं माना जाएगा।
पीठ ने अधिनियम की धारा 3(1)(s) और धारा 3(1)(r) पर पहले के फैसलों का हवाला देते हुए चार मूलभूत तत्व स्पष्ट किए, जो इस कानून के तहत अपराध स्थापित करने के लिए जरूरी हैं:
- आरोपी व्यक्ति अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं होना चाहिए।
- आरोपी को जानबूझकर किसी SC/ST सदस्य का अपमान करना या डराना-धमकाना चाहिए।
- आरोपी का इरादा उस व्यक्ति को अपमानित करने का होना चाहिए।
- घटना सार्वजनिक स्थान पर होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जाति के प्रति जानबूझकर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है, तब ही इसे अपराध माना जाएगा।
न्यायालय ने इस स्पष्टिकरण से SC/ST एक्ट के दुरुपयोग की संभावनाओं को रोकने और कानून के वास्तविक उद्देश्य – अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा – को सुनिश्चित करने पर जोर दिया।