Tuesday, January 20

राम मंदिर निमंत्रण ठुकराया, पीएम मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतारा: विवादों से रहा है स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाता

 

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प्रयागराज। माघ मेले में मौनी अमावस्या पर्व पर स्नान के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थकों और पुलिस के बीच हुई धक्का-मुक्की ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। स्नान से वंचित रहने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठ गए हैं। इस घटनाक्रम के साथ ही एक बार फिर उनके पुराने तेवर और विवादित बयानों की चर्चा तेज हो गई है।

 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इससे पहले भी कई बार अपने बयानों और फैसलों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने का निमंत्रण ठुकरा दिया था। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उन्हें उत्तराखंड स्थित ज्योतिष पीठ का 46वां शंकराचार्य नियुक्त किया गया था।

 

छात्र राजनीति से संन्यास तक का सफर

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वर्ष 2006 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली थी। दीक्षा से पहले उनका नाम उमाशंकर उपाध्याय था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। उन्होंने वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्री प्राप्त की। संन्यास लेने से पहले वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1994 में छात्रसंघ चुनाव जीत चुके हैं।

 

केदारनाथ से 228 किलो सोना गायब होने का आरोप

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने तीखे बयानों के चलते अक्सर चर्चा में रहते हैं। उन्होंने केदारनाथ धाम से 228 किलोग्राम सोना गायब होने का आरोप लगाकर हलचल मचा दी थी। उनका कहना था कि इतनी बड़ी मात्रा में सोना गायब हुआ है, लेकिन अब तक कोई ठोस जांच नहीं हुई। उन्होंने सवाल उठाया था कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

 

पीएम मोदी के खिलाफ उतारा था उम्मीदवार

राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बोलने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने समर्थित उम्मीदवार को मैदान में उतारा था। हालांकि, उसे चुनाव में कोई खास सफलता नहीं मिली। इससे पहले वर्ष 2008 में उन्होंने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने की मांग को लेकर अनशन भी किया था।

 

माघ मेले के ताजा विवाद के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच टकराव और गहराएगा या किसी समझौते की राह निकलेगी। फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक और धार्मिक हलकों की नजर बनी हुई है।

 

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