
ईरान में हिंसा की आग भड़क रही है और इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कूटनीतिक गतिविधियों में जुटे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के बहाने ट्रंप ब्रिक्स देशों को भी टारगेट कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यह समूह उनके डॉलर हegemony के लिए चुनौती बन सकता है।
अमेरिका ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ की धमकी दी है। हालांकि इसका प्रत्यक्ष असर भारत पर सीमित रहने का अनुमान है, फिर भी सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत मौजूदा वित्त वर्ष में ईरान से व्यापार को और कम करने की तैयारी कर रहा है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब भारत-ईरान के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ का साल भी है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में BRICS 2026 शिखर सम्मेलन के लिए भारत के विजन का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के अध्यक्ष के रूप में भारत अंतरसरकारी संगठनों को ‘वैश्विक झटकों’ के प्रभाव से बचाने पर जोर देगा। इस मौके पर रूसी और ईरानी राजदूत भी मौजूद थे।
भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है, जिसमें ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। जनवरी 2024 से ईरान भी इसका सदस्य बन चुका है, जबकि मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब, UAE और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसके नए सदस्य हैं। विस्तारित BRICS का लक्ष्य डॉलर-मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है, जो अमेरिका को चुनौती के रूप में नजर आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का ईरान पर सैन्य दबाव और टैरिफ की धमकी, ब्रिक्स को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। 2025 में रियो डी जनेरियो में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम पर चर्चा की थी। इसका उद्देश्य था कि देशों को डॉलर में लेन-देन करने की बाध्यता न हो और वे अपनी मुद्रा का इस्तेमाल कर सकें। यही अमेरिका के लिए चुनौती बन रही है।
भारत इस साल होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला है, जिसमें ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के भी शामिल होने की संभावना है। ऐसे में भारत की ईरान नीति पर वैश्विक नजरें टिकी हुई हैं। अमेरिका की तेवरबाजी और ईरान की राजनीतिक अस्थिरता के बीच भारत के लिए संतुलन बनाना एक नया कूटनीतिक चुनौती बन गया है।