Tuesday, January 13

RCP सिंह की JDU में वापसी? नीतीश की जरूरत या कुर्मी नेता की मजबूरी, जानिए इनसाइड स्टोरी

 

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पटना: बिहार के सियासी गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है – क्या पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह (रामचंद्र प्रसाद सिंह) फिर से जनता दल यूनाइटेड (JDU) का दामन थामने वाले हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सार्वजनिक कार्यक्रम में दिखने और उनके प्रति नरम रुख अपनाने के बाद इस अटकल को और बल मिला है।

 

कभी नीतीश के सबसे भरोसेमंद और JDU के ‘नंबर दो’ रहे आरसीपी सिंह ने अब सीएम को अपना ‘अभिभावक’ बताया है। इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं – क्या जेडीयू में वापसी कुर्मी नेता आरसीपी सिंह की मजबूरी बन गई है, या यह नीतीश कुमार की रणनीति का हिस्सा है?

 

 

दही-चूड़ा भोज ने कम की दूरियां

 

हाल ही में पटेल सेवा संघ द्वारा आयोजित दही-चूड़ा भोज में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह दोनों शामिल हुए। दोनों अलग-अलग समय पर पहुंचे, लेकिन कार्यक्रम के बाद आरसीपी सिंह के बयानों ने सभी को चौंका दिया। जब मीडिया ने उनसे जेडीयू में वापसी पर सवाल किया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “जल्द ही पता चल जाएगा।”

 

इसके साथ ही उन्होंने नीतीश कुमार को ‘भारत रत्न’ देने की मांग का समर्थन किया और उन्हें अपना ‘अभिभावक’ बताया।

 

 

25 साल पुराना रिश्ता

 

आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार का रिश्ता लगभग 25 साल पुराना है। मूल रूप से नालंदा के मुस्तफापुर के रहने वाले आरसीपी सिंह, नीतीश कुमार की तरह कुर्मी समुदाय से आते हैं।

 

1984 बैच के यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी रहे सिंह की मुलाकात नीतीश कुमार से 1996 में हुई। नीतीश ने उनकी कार्यशैली को इतना पसंद किया कि उन्हें रेल मंत्रालय में अपना विशेष सचिव और बाद में बिहार के मुख्यमंत्री बनने पर प्रधान सचिव बनाया।

 

2010 में वीआरएस लेकर आरसीपी सिंह राजनीति में आए, राज्यसभा पहुंचे और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक का सफर तय किया।

 

 

जेडीयू छोड़ने के बाद संकट में राजनीति

 

आरसीपी सिंह जब तक JDU में रहे, उनका रुतबा बना रहा। हालांकि नीतीश कुमार के साथ रिश्तों में खटास आने पर उन्होंने जेडीयू से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे बीजेपी में शामिल हुए, लेकिन वहाँ उन्हें वह अहमियत नहीं मिली जिसकी उन्हें उम्मीद थी।

 

बाद में उन्होंने बिहार में अपनी पार्टी बनाई, फिर प्रशांत किशोर की जन सुराज में अपनी पार्टी का विलय किया। इस दौरान उन्होंने अपनी बेटी लता सिंह को नीतीश कुमार की पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ मैदान में उतारा, लेकिन चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और जमानत भी जब्त हो गई।

 

 

अब घर वापसी या मजबूरी?

 

सियासी जानकार मानते हैं कि जेडीयू छोड़ने के अनुभव ने आरसीपी सिंह को यह एहसास दिलाया होगा कि जेडीयू उनके लिए सबसे उपयुक्त मंच है। वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोकी नाथ दुबे के अनुसार, आरसीपी सिंह के लिए यह वापसी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की मजबूरी हो सकती है।

 

हालांकि, नीतीश कुमार के लिए अनुभवी संगठनकर्ता और कुर्मी नेता का साथ फायदेमंद साबित हो सकता है। खरमास के बाद इस मुद्दे पर सियासी समीकरण क्या मोड़ लेते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।

 

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