Friday, June 19

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ट्रंप–पॉवेल टकराव: फेड की स्वायत्तता पर संकट, भारत पर पड़ सकता है दूरगामी असर

नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल के बीच टकराव अब अभूतपूर्व और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा पॉवेल के खिलाफ आपराधिक जांच शुरू किए जाने से न केवल अमेरिकी राजनीति में हलचल मची है, बल्कि वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। इस घटनाक्रम का असर भारत सहित उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ना तय माना जा रहा है।

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यह जांच फेडरल रिजर्व के मुख्यालय के 2.5 अरब डॉलर के रिनोवेशन और कांग्रेस को दी गई पॉवेल की गवाही से जुड़ी बताई जा रही है। पॉवेल ने इसे सीधे तौर पर ब्याज दरें घटाने के लिए राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास करार दिया है। उनका कहना है कि यह कदम फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को कमजोर करने की कोशिश है—एक ऐसी संस्था, जिसकी स्वायत्तता अमेरिकी मौद्रिक नीति की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

फेड की स्वायत्तता दांव पर

पॉवेल ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यह मामला केवल उनकी व्यक्तिगत छवि या पद का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या फेड भविष्य में भी आर्थिक तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर फैसले ले पाएगा या फिर राजनीतिक दबाव के आगे झुकना पड़ेगा। अमेरिकी इतिहास में किसी राष्ट्रपति और फेड चीफ के बीच इस स्तर का टकराव पहले कभी नहीं देखा गया।

ट्रंप लंबे समय से ब्याज दरों में कटौती की मांग करते रहे हैं। उनका मानना है कि कम दरें शेयर बाजारों को सहारा देंगी, आर्थिक वृद्धि को तेज करेंगी और सरकार के भारी कर्ज पर ब्याज का बोझ कम करेंगी। इसके साथ ही कमजोर डॉलर से अमेरिकी निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा। रियल एस्टेट पृष्ठभूमि से आने वाले ट्रंप सस्ते कर्ज को आर्थिक समृद्धि की कुंजी मानते हैं, भले ही इससे दीर्घकालिक जोखिम क्यों न बढ़ें।

बाजारों की त्वरित प्रतिक्रिया

इस टकराव के संकेत मिलते ही डॉलर में कमजोरी आई, अमेरिकी शेयर वायदा बाजारों में गिरावट दर्ज की गई और ट्रेजरी बॉन्ड की कीमतों में तेजी दिखी। निवेशकों के लिए यह केवल ब्याज दरों का सवाल नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता का मामला बन गया है। यदि फेड पर राजनीतिक नियंत्रण की धारणा मजबूत होती है, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिका की विश्वसनीयता को झटका लग सकता है।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत के लिए इस घमासान के प्रभाव मुख्य रूप से वैश्विक पूंजी प्रवाह के जरिए सामने आएंगे। डॉलर में कमजोरी और अमेरिकी ब्याज दरों में संभावित कटौती से उभरते बाजारों, खासकर भारत, की ओर विदेशी निवेश बढ़ सकता है। ऊंची वास्तविक ब्याज दरों और अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक आधार के कारण भारत वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बन सकता है।

हालांकि तस्वीर इतनी सरल नहीं है। यदि अमेरिकी दरों में कटौती को आर्थिक जरूरत के बजाय राजनीतिक दबाव का नतीजा माना गया, तो निवेशकों का भरोसा जल्दी डगमगा सकता है। ऐसी स्थिति में शुरुआती पूंजी प्रवाह के बाद अचानक निकासी का जोखिम भी बढ़ जाएगा। फेड की विश्वसनीयता कमजोर पड़ने पर अमेरिका की लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती है, जिससे पूंजी दोबारा अमेरिका की ओर लौट सकती है और भारत जैसे बाजारों पर दबाव आ सकता है।

निष्कर्ष

ट्रंप और पॉवेल के बीच यह टकराव केवल अमेरिका की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता और निवेशकों के भरोसे की अग्निपरीक्षा है। भारत के लिए यह अवसर और जोखिम—दोनों लेकर आया है। अल्पकाल में पूंजी प्रवाह से राहत मिल सकती है, लेकिन दीर्घकाल में वैश्विक अस्थिरता का असर भारतीय बाजारों को भी झेलना पड़ सकता है। ऐसे में निवेशकों और नीति-निर्माताओं—दोनों के लिए सतर्क रहना जरूरी होगा।

 

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