
दरभंगा (बिहार): मिथिला क्षेत्र और बिहार के लोगों के लिए एक युग का अंत हो गया है। दरभंगा राज परिवार की अंतिम वारिस, महारानी कामसुंदरी देवी, 96 वर्ष की उम्र में सोमवार को निधन हो गईं। उनके साथ ही सन 1535 में स्थापित इस प्राचीन राज परिवार की आखिरी पीढ़ी का इतिहास में दर्ज होना तय हो गया।
महारानी कामसुंदरी: दयालु और आधुनिक सोच वाली
महारानी कामसुंदरी देवी दरभंगा के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। वे न केवल मिथिला क्षेत्र में, बल्कि बिहार के अन्य हिस्सों में भी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहीं। महाराजा कामेश्वर सिंह ने उन्हें आधुनिक शिक्षा और रीति-रिवाजों से परिचित कराने का विशेष ध्यान रखा। इसके चलते महारानी कामसुंदरी उत्कृष्ट फोटोग्राफर भी बन गईं, और उनके द्वारा ली गई तस्वीरें दरभंगा के राजमहल, कल्याणी निवास और कल्याणी फाउंडेशन में सजी हुई हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान
महारानी कामसुंदरी ने महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन का नेतृत्व किया और क्षेत्र के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास में अहम योगदान दिया। इसके अलावा वे कामेश्वर रिलीजियस ट्रस्ट की भी जिम्मेदार थीं। उनके निधन के बाद इस ट्रस्ट की जिम्मेदारी कपिलेश्वर सिंह और उनके परिवार को सौंप दी जाएगी।
दरभंगा राज परिवार का इतिहास
दरभंगा राजशाही की स्थापना 1535 में महेश ठाकुर ने की थी। इस राज में मिथिला का लगभग 8,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र शामिल था। महाराजा कामेश्वर सिंह 1929 से 1952 तक दरभंगा के अंतिम शासक रहे। वे दो बार राज्यसभा सदस्य भी रहे। देश की आज़ादी के बाद राज परिवार की अधिकांश संपत्तियां सरकार ने अधिग्रहित कर ली थीं।
महारानी की वसीयत और संपत्ति
महाराजा कामेश्वर सिंह ने अपनी दोनों रानियों को दरभंगा में महल और मासिक 50-50 हजार रुपये देने का नियम बनाया था। उनकी वसीयत के अनुसार, संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा लोकहित के लिए रखा गया। महारानी कामसुंदरी के निधन के बाद ट्रस्ट और संपत्ति की देखरेख कपिलेश्वर सिंह के परिवार को सौंपी जाएगी।
समाप्ति का शोक
महारानी कामसुंदरी के निधन से मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। यह सिर्फ एक बुजुर्ग महिला के निधन का शोक नहीं है, बल्कि 491 साल पुराने दरभंगा राज परिवार के अंतिम सदस्य के दुनिया से जाने का भी दर्द है।