Thursday, January 1

‘दहेज और फिजूलखर्ची इस्लाम के खिलाफ’, मौलाना महमूद मदनी ने समाज की कुरीतियों पर उठाई आवाज

 

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जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने दहेज प्रथा और गैरजरूरी फिजूलखर्ची को इस्लाम की मूल शिक्षाओं के खिलाफ बताते हुए समाज से इन्हें जड़ से समाप्त करने का आह्वान किया है। उत्तर प्रदेश के शामली में आयोजित एक बड़े जलसे को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज गमी और खुशी दोनों अवसरों पर ऐसी रस्में निभाई जा रही हैं, जो न केवल इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं, बल्कि समाज को भी कमजोर कर रही हैं।

 

दहेज और दिखावे से समाज हो रहा कमजोर

 

मौलाना मदनी ने कहा कि दहेज प्रथा और अनावश्यक खर्च आम लोगों पर आर्थिक बोझ डालते हैं और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सादगी इस्लाम की पहचान है और निकाह व अन्य सामाजिक आयोजनों में सादगी अपनाना ही सही रास्ता है। उन्होंने लोगों से दहेज-मुक्त समाज के निर्माण में आगे आने की अपील की।

 

‘फसाद नहीं, माफी है असली बहादुरी’

 

अपने संबोधन में मौलाना मदनी ने सामाजिक सौहार्द पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि फसाद करना कोई बहादुरी नहीं है, बल्कि माफ करना ही असली कमाल और हिम्मत की पहचान है। उन्होंने समाज में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता जताते हुए आपसी भाईचारे को मजबूत करने की जरूरत बताई।

 

नशे और सामाजिक बुराइयों पर चिंता

 

जलसे में मौजूद मौलाना मुफ्ती अफ्फान ने युवाओं में बढ़ती नशे की लत पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि नशा आज के युवाओं को बर्बादी की ओर ले जा रहा है, जो पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है।

वहीं, मौलाना अब्दुल मालिक मुगेसी ने शिक्षा (तालीम) को समाज सुधार की सबसे मजबूत नींव बताते हुए बच्चों और युवाओं को आधुनिक व धार्मिक शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया।

 

सादगी और सुधार का संदेश

 

जलसे के माध्यम से मौलानाओं ने समाज को स्पष्ट संदेश दिया कि दिखावे, दहेज और नशे जैसी कुरीतियों को छोड़कर ही एक स्वस्थ, मजबूत और नैतिक समाज का निर्माण संभव है।

 

 

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