
नई दिल्ली: भारत की सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा कर दुनिया भर की न्यायपालिका के लिए मिसाल कायम की है। इतनी बड़ी संख्या में मामलों का समाधान, जजों की सीमित संख्या के बावजूद, भारतीय न्यायपालिका की क्षमता को दर्शाता है। तुलना करें तो अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश इस मामले में भारत से काफी पीछे हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाल ही में ‘एक्सप्लोरिंग द एफिशिएंसी एंड रीच ऑफ मीडिएशन’ नेशनल कॉन्फ्रेंस में कहा कि देश में मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नए और व्यवहारिक समाधान की ओर देखना आवश्यक है। उन्होंने मीडिएशन को एक प्रभावी उपाय बताया, जिसमें दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद सुलझा सकते हैं, न कि परंपरागत अदालतों की लंबी प्रक्रिया में उलझे रहें।
भारत की तुलना में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हर साल हजारों मामलों में से केवल 70-80 मामलों पर बहस होती है। ब्रिटेन में हालिया आंकड़ों के अनुसार 29 दिसंबर तक सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल 200 से अधिक मामले आए और उसमें से लगभग 50 ही निपटाए गए। इसके विपरीत, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 1,400 बड़े फैसले सुनाए और हजारों आदेशों के जरिए मामले सुलझाए।
भारतीय न्यायपालिका में जजों की संख्या अत्यंत कम है। देश में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 21 जज हैं, जबकि अमेरिका में इतनी ही आबादी पर 150 जज कार्यरत हैं। विधि आयोग की 1987 की रिपोर्ट में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 50 जजों की सिफारिश की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में जजों की स्वीकृत संख्या 34 है, जो 150 करोड़ की आबादी के मुकाबले बेहद कम है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ भी कह चुके हैं कि देश में न्यायपालिका की संख्या बढ़ाना जरूरी है और सरकार के साथ लगातार इस दिशा में संवाद किया जा रहा है। इसके बावजूद, 2025 में सुप्रीम कोर्ट का प्रदर्शन वैश्विक स्तर पर सराहनीय और प्रेरणादायक रहा।