
बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले भड़की हिंसा के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की सुनियोजित साजिश सामने आ रही है। खुफिया सूत्रों और घटनाक्रम के पैटर्न से संकेत मिल रहे हैं कि ISI, बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत कर सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश में जुट गई है। इस पूरे अभियान में उसका मुख्य लक्ष्य भारत विरोधी माहौल बनाना है।
कट्टरपंथी छात्र नेता और इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत ने इस साजिश को हवा देने का काम किया है। हादी की मौत के बाद जिस तरह ढाका समेत पूरे देश में हिंसा फैली, उसने ISI की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा
12 दिसंबर को ढाका में चुनाव प्रचार के दौरान अज्ञात नकाबपोश हमलावरों ने उस्मान हादी को सिर में गोली मार दी थी। गंभीर रूप से घायल हादी को बाद में सिंगापुर ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। गुरुवार रात जैसे ही उनकी मौत की खबर फैली, राजधानी ढाका सहित कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए।
प्रदर्शनकारियों ने देश के प्रमुख अखबारों प्रथोम आलो और द डेली स्टार के दफ्तरों में आगजनी की। इसके अलावा, धनमंडी-32 स्थित बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान के पूर्व आवास को भी एक बार फिर निशाना बनाया गया। हिंसा की आग राजशाही, चटगांव और मैमनसिंह तक फैल गई, जहां अवामी लीग के दफ्तरों पर हमले किए गए।
ISI का ऑपरेटिंग पैटर्न
सूत्रों के अनुसार, ISI ने अपनी पुरानी सहयोगी जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े छात्र संगठनों व मदरसों को सीधे आंदोलन का चेहरा बनने से रोका है। रणनीति यह है कि स्थानीय प्रदर्शनकारी आगे रहें, जबकि पीछे से संगठित नेटवर्क आंदोलन को दिशा और संसाधन मुहैया कराए। इससे हिंसा को ‘जनस्वाभाविक आक्रोश’ का रूप देने की कोशिश की जा रही है।
भारत विरोधी एजेंडा तेज
ISI की इस पूरी गतिविधि का केंद्र भारत विरोध है। सोशल मीडिया पर सक्रिय कई हैंडल पाकिस्तान से संचालित बताए जा रहे हैं, जिनके जरिए भारत के खिलाफ लगातार दुष्प्रचार किया जा रहा है। कुछ बांग्लादेशी मीडिया प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनलों को भी पाकिस्तान समर्थित नेटवर्क से फंडिंग मिलने के संकेत हैं।
रणनीतिक रूप से बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा कर ISI भारत के पूर्वी हिस्से पर दबाव बनाना चाहती है। यही वजह है कि भारतीय मिशनों के बाहर प्रदर्शन, ‘बायकॉट इंडिया’ जैसे नारे और राजनयिक ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिशें बढ़ी हैं।
चुनाव से पहले बढ़ी चिंता
फरवरी 2026 में प्रस्तावित आम चुनावों से पहले इस तरह की हिंसा ने बांग्लादेश की सुरक्षा, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि हालात पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो इसका असर न सिर्फ बांग्लादेश बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है।