Tuesday, February 3

अमेरिका की ‘रोबोट आर्मी’ से चीन को खुली चुनौती 50 हजार ह्यूमनॉइड रोबोट्स तैयार करेगा अमेरिका, जानिए ‘फैंटम MK-1’ की ताकत

दुनिया में आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब वह दौर दूर नहीं, जब सीमाओं पर इंसानी सैनिकों की जगह रोबोट मोर्चा संभालते नजर आएंगे। चीन के बाद अब अमेरिका भी रोबोट आर्मी बनाने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा चुका है। सैन फ्रांसिस्को स्थित एक रोबोटिक्स कंपनी फाउंडेशन ने 2027 तक 50 हजार ह्यूमनॉइड रोबोट तैयार करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इन रोबोट्स का नाम ‘फैंटम MK-1’ रखा गया है।

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युद्ध और उद्योग, दोनों में इस्तेमाल

फैंटम MK-1 सिर्फ फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे सीधे युद्ध के मैदान में भी उतारने की तैयारी है। ये रोबोट दुश्मन इलाके में जासूसी, बम निष्क्रिय करने और अत्यधिक जोखिम भरे मिशनों में सबसे आगे भेजे जाएंगे, ताकि इंसानी सैनिकों की जान सुरक्षित रहे।

कद-काठी और क्षमता

फैंटम MK-1 की ऊंचाई करीब 5 फीट 9 इंच है और वजन लगभग 175 से 180 पाउंड है। इसे खास तौर पर ऐसे कामों के लिए डिजाइन किया गया है, जहां इंसानों के लिए खतरा ज्यादा होता है। यह रोबोट लगातार लंबे समय तक काम कर सकता है और एक साथ कई लोगों के काम की जगह ले सकता है।

2027 तक 50 हजार रोबोट

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी पहले 2026 तक 10 हजार रोबोट बनाने की योजना पर काम कर रही थी, लेकिन अब लक्ष्य बढ़ाकर 50 हजार कर दिया गया है।

  • 2025 में: लगभग 40 रोबोट
  • 2026 में: 10 हजार रोबोट
  • 2027 के अंत तक: कुल 50 हजार रोबोट

कंपनी की टीम में टेस्ला, बोस्टन डायनेमिक्स और स्पेसएक्स जैसी दिग्गज कंपनियों के पूर्व कर्मचारी शामिल हैं।

बिकेंगे नहीं, किराए पर मिलेंगे

फाउंडेशन इन रोबोट्स को बेचेगी नहीं, बल्कि किराए पर देगी। एक रोबोट का सालाना किराया करीब 1 लाख डॉलर (लगभग 90 लाख रुपये) तय किया गया है। कंपनी का दावा है कि एक रोबोट कई इंसानों का काम कर सकता है, जिससे लागत में बड़ी बचत होगी।

सेंसर नहीं, कैमरों पर भरोसा

फैंटम MK-1 में महंगे सेंसर की जगह उन्नत कैमरे लगाए गए हैं। इससे डेटा प्रोसेसिंग आसान होती है और कठिन परिस्थितियों में भी रोबोट बेहतर प्रदर्शन करता है। इसमें खास एक्ट्यूएटर लगे हैं, जो ज्यादा ताकत देने के साथ कम आवाज करते हैं और इंसानों के आसपास सुरक्षित रहते हैं।

इंसान के हाथ में रहेगा कंट्रोल

कंपनी का साफ कहना है कि ये रोबोट खुद से हथियार चलाने का फैसला नहीं करेंगे। गोली चलानी है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय मानव ऑपरेटर ही लेगा। यानी तकनीक कितनी भी उन्नत हो, नियंत्रण इंसान के हाथ में रहेगा।

युद्ध को आसान बना देगी तकनीक?

हालांकि विशेषज्ञों की चिंता भी सामने आ रही है। माना जा रहा है कि जब सैनिकों की जान का खतरा कम होगा, तो युद्ध शुरू करने के राजनीतिक फैसले आसान हो सकते हैं। यही वजह है कि रोबोट आर्मी को लेकर दुनिया भर में नैतिक और रणनीतिक बहस तेज हो गई है।

चीन पहले ही कर चुका है शुरुआत

गौरतलब है कि इससे पहले चीन ने भी वियतनाम सीमा पर रोबोट तैनात करने की योजना बनाई थी और इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। अब अमेरिका की यह पहल साफ संकेत देती है कि आने वाले समय में युद्ध का मैदान इंसानों से ज्यादा मशीनों का होगा

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