
वैश्विक व्यापार में बढ़ते टैरिफ तनाव और पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और अरब देशों के विदेश मंत्रियों की दूसरी अहम बैठक कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लगभग एक दशक के अंतराल के बाद आयोजित यह बैठक भारत–अरब संबंधों को नई ऊर्जा देने के साथ-साथ भविष्य की रणनीति तय करने का मंच बनेगी।
एक दशक बाद फिर कूटनीतिक संवाद
भारत और अरब देशों के बीच पहली विदेश मंत्रियों की बैठक वर्ष 2016 में बहरीन में हुई थी। उस बैठक में अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति—इन पांच क्षेत्रों को सहयोग के प्रमुख स्तंभ के रूप में चिन्हित किया गया था। दस साल बाद हो रही यह दूसरी बैठक इस बात का संकेत है कि भारत और अरब जगत बदलते वैश्विक हालात में अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं।
टैरिफ संकट और आर्थिक साझेदारी
जब दुनिया के कई हिस्सों में संरक्षणवाद और टैरिफ युद्ध तेज हो रहे हैं, ऐसे समय में भारत और अरब देशों के बीच यह संवाद आर्थिक दृष्टि से खास महत्व रखता है। ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन की स्थिरता और निवेश सहयोग जैसे मुद्दे इस बैठक के केंद्र में रहने की उम्मीद है। भारत के लिए खाड़ी देश कच्चे तेल और गैस के प्रमुख स्रोत हैं, वहीं अरब देशों के लिए भारत एक विशाल बाजार और भरोसेमंद आर्थिक साझेदार है।
रणनीतिक और राजनीतिक संदेश
इस बैठक की सह-अध्यक्षता भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) कर रहे हैं, जो दोनों देशों के बीच गहराते रणनीतिक रिश्तों को दर्शाता है। अरब लीग के लगभग 15 सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की संभावित भागीदारी इसे एक मजबूत पैन-अरब मंच बनाती है।
विशेष रूप से सीरिया के विदेश मंत्री की संभावित मौजूदगी पर सबकी नजर है। यदि ऐसा होता है, तो नई सरकार के गठन के बाद भारत और सीरिया के बीच यह पहली उच्च-स्तरीय बातचीत होगी—जो पश्चिम एशिया में भारत की संतुलित और संवाद-आधारित कूटनीति को रेखांकित करती है।
पश्चिम एशिया की उथल-पुथल में भारत की भूमिका
यमन को लेकर सऊदी अरब और UAE के बीच बढ़ते मतभेद, सऊदी अरब का पाकिस्तान और तुर्किये के साथ बढ़ता सहयोग, तथा UAE के इज़राइल के साथ मजबूत होते संबंध—इन सबके बीच यह बैठक भारत के लिए एक अवसर है कि वह खुद को एक स्थिर, भरोसेमंद और संतुलनकारी साझेदार के रूप में प्रस्तुत करे।
क्यों है यह बैठक अहम?
- संस्थागत मजबूती: अरब–भारत सहयोग मंच को नई दिशा देने का अवसर।
- आर्थिक हित: टैरिफ संकट के दौर में वैकल्पिक बाजार और निवेश साझेदारी।
- रणनीतिक संतुलन: पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच भारत की सक्रिय भूमिका।
- दीर्घकालिक दृष्टि: ऊर्जा, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढालना।