Saturday, January 17

बीजेपी ने एक दिन में पवार और ठाकरे ब्रांड की चमक फीकी नहीं की, कई गलतियां उद्धव और शरद पवार से हुई

 

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मुंबई: महाराष्ट्र के बीएमसी और निकाय चुनावों के नतीजों ने राजनीति की पुरानी परंपराओं को झकझोर दिया है। लंबे समय तक जिन बड़े नेताओं का नाम किसी इलाके में जीत की गारंटी माना जाता था—जैसे ठाकरे परिवार और पवार फैमिली—उनकी चमक इस चुनाव में फीकी पड़ती नजर आई।

 

मुंबई में 25 साल बाद ठाकरे परिवार बीएमसी की सत्ता गंवा बैठा। उद्धव और राज ठाकरे का साथ इस बार कामयाब नहीं रहा। वहीं पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में शरद पवार और अजित पवार को करारी हार का सामना करना पड़ा। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि परिवार का नाम जीत की गारंटी है, लेकिन इस बार भाजपा की आंधी ने यह नैरेटिव बदल दिया।

 

बाल ठाकरे की रणनीति और पार्टी की मजबूती

बाल ठाकरे ने 70 के दशक से मुंबई में शिवसेना की शाखाओं का नेटवर्क मजबूत किया। मराठी मानूस की जरूरतों से जुड़ने और राम मंदिर आंदोलन के दौरान हिंदुत्व को जोड़ने से शिवसेना ने मराठी और अन्य राज्यों के हिंदू वोटरों में पकड़ बनाई। साथ ही, गैर-मराठियों को भी पार्टी में बड़ी भूमिका दी।

 

1997 में पहली बार बीएमसी फतह के बाद पार्टी ने लगातार 25 साल तक जीत का सिलसिला बनाए रखा। 2019 में बीजेपी और शिवसेना के अलग होने के बाद भाजपा ने अपने वोटरों को सक्रिय कर बड़ा फ़ायदा उठाया।

 

उद्धव ठाकरे की भूल और संवाद की कमी

उद्धव ठाकरे ने मातोश्री को पावर सेंटर बनाकर शक्ति का केंद्र तो बनाए रखा, लेकिन स्थानीय शाखाओं और जनता के साथ संवाद में कमी आने लगी। बीजेपी से अलग होने और वैचारिक बदलाव ने ठाकरे ब्रांड की विश्वसनीयता को भी झटका दिया। 16 जनवरी के नतीजों में उद्धव को मुस्लिम वोट मिले, लेकिन बीजेपी ने हिंदू वोटों पर पकड़ मजबूत की। मुंबई में बीजेपी को 21%, यूबीटी को 13%, शिंदे शिवसेना को 4%, और मनसे को केवल 1.3% वोट मिले।

 

पवार फैमिली की ताकत भी फीकी

पश्चिम महाराष्ट्र में बीजेपी ने शरद-पवार फैमिली की राजनीति को चुनौती दी। सहकारी समितियों और बैंकों में नियम-कानून के दायरे में आते ही पवार परिवार की मनमानी कम हुई। अजित पवार बागी बने और किसानों और ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की नीतियों ने पार्टी को फायदा पहुंचाया।

 

इस तरह, किसान, महिला और ग्रामीण वोटरों की भूमिका ने बीजेपी को इस चुनाव में मजबूत आधार दिया और पारंपरिक नेताओं की चमक को कम कर दिया।

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