Saturday, January 10

सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद भी विवाद जारी, अरावली की सुरक्षा पर एक्टिविस्ट की चिंता

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वत रेंज की नई परिभाषा पर रोक लगा दी है। अब 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा। यह निर्णय पर्यावरण एक्टिविस्ट और स्थानीय समुदायों के लिए राहत भरा है, लेकिन उनका मानना है कि अरावली के पूर्ण संरक्षण के बिना विवाद खत्म नहीं होगा।

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नीलम अहलूवालिया का इंटरव्यू:
अरावली विरासत जन अभियान और पीपल फॉर अरावली की फाउंडर मेंबर नीलम अहलूवालिया ने कहा, हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन एक्सपर्ट कमेटी तय करेगी कि कौन सी पहाड़ियां अरावली का हिस्सा हैं। हमें अरावली को परिभाषित करने की जरूरत नहीं, बल्कि इसके पूर्ण संरक्षण और बचाव की जरूरत है।

नीलम ने कहा कि पिछले कई दशकों में अरावली खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों के कारण भारी नुकसान झेल चुकी है। अवधारणाओं और नियमों के बावजूद कई कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो गई हैं। इससे माइनिंग और निर्माण गतिविधियों की राह आसान हो जाएगी।

नई परिभाषा का असर:
20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दी थी। इसमें केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली माना गया। हरियाणा का फॉरेस्ट कवर केवल 3.6% है और नई परिभाषा इसे और कम कर सकती है। राजस्थान और गुजरात में भी कई क्षेत्र अब माइनिंग और रियल एस्टेट कंपनियों के लिए खुल जाएंगे।

अवधारणाओं और लोगों पर प्रभाव:
अरावली के आसपास बसे लोग आजीविका के लिए इन पहाड़ियों पर निर्भर हैं। मवेशी चराना, खेती और जलाशयों पर निर्भरता आम है। खनन से त्वचा, लीवर और किडनी की समस्याएं बढ़ रही हैं। दमा, COPD और TB जैसी बीमारियां भी बढ़ रही हैं। पहाड़ों पर ब्लास्ट के कारण मकान दरक रहे हैं।

नीलम ने कहा कि अरावली की चारों राज्यों में फैली रेंज पर सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव का व्यापक अध्ययन होना चाहिए। इसमें वॉटर रिचार्ज जोन, जलवायु नियामक, प्रदूषण सोखने वाले स्रोत, वन्यजीव आवास और आसपास बसे लोगों की सेहत व आजीविका का भी मूल्यांकन शामिल होना चाहिए।

अरावली को हुआ नुकसान:
पिछले दशकों में 692 किलोमीटर में फैली अरावली पर्वत रेंज में 12 बड़ी दरारें खुल चुकी हैं। राजस्थान के अजमेर से झुंझुनू और दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक फैली ये दरारें थार की धूल दिल्ली-NCR तक पहुंचा रही हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ रहा है। नई परिभाषा लागू होने से अरावली की और अधिक पहाड़ियां नष्ट हो सकती हैं।

नीलम अहलूवालिया ने स्पष्ट किया कि आंदोलन अभी जारी रहेगा। उनका मानना है कि सिर्फ स्टे से विवाद समाप्त नहीं होगा, अरावली के पूर्ण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

 

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