Wednesday, January 7

श्मशान में चिता की आग तो जली, पर बुझ गई सरकारी लाइट, गाड़ियों की हेडलाइट में दी गई अंतिम विदाई

 

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भरतपुर: काली बगीची श्मशान घाट में प्रशासन की लापरवाही का एक और उदाहरण सामने आया है। यहां एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार के दौरान परिजनों को अंधेरे में अपनी गाड़ियां खड़ी करके चिता को जलाना पड़ा।

 

जब मोरी चार बाग निवासी 70 वर्षीय अशोक कुमार का निधन हुआ, तो उनका परिवार श्मशान घाट में अंतिम संस्कार के लिए पहुंचा। शाम के करीब सात बजे जैसे ही परिजन वहां पहुंचे, उन्हें वहां घना अंधेरा और सन्नाटा मिला। श्मशान की स्ट्रीट लाइटें बंद थीं, और वहां कोई चौकीदार भी मौजूद नहीं था। परिजनों को मजबूरी में अपनी गाड़ियों की हेडलाइट और मोबाइल की फ्लैशलाइट की रोशनी में लगभग दो घंटे तक संघर्ष करते हुए अंतिम संस्कार करना पड़ा।

 

नगर निगम और बिजली कंपनी के बीच आरोप-प्रत्यारोप

 

इस घटना के बाद जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। नगर निगम आयुक्त श्रवण विश्नोई ने दावा किया कि इलाके में तकनीकी खराबी (फाल्ट) के कारण लाइट बंद हो गई थी। उन्होंने जल्द इंजीनियर भेजने की बात कही। वहीं, बिजली कंपनी के पीआरओ सुधीर प्रताप ने निगम के दावों को नकारते हुए कहा कि इलाके में किसी प्रकार की सप्लाई बंद नहीं हुई थी, और कोई फाल्ट भी नहीं था।

 

पिछला मामला भी लापरवाही का

 

यह पहली बार नहीं हुआ है। महज एक महीने पहले भी इस श्मशान घाट पर एक और व्यक्ति का अंतिम संस्कार टॉर्च की रोशनी में किया गया था। उस वक्त निगम आयुक्त ने माफी मांगते हुए व्यवस्था सुधारने का वादा किया था, लेकिन अब इस घटना से यह स्पष्ट हो गया कि वह वादा भी सिर्फ एक बयान बनकर रह गया।

 

प्रशासन की संवेदनहीनता पर सवाल उठ रहे हैं

 

यह घटना प्रशासन की संवेदनहीनता की कहानी बयान करती है, जहां इंसान की अंतिम यात्रा भी बिना proper व्यवस्था के संपन्न नहीं हो पाती। इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जैसे कि क्या हम वास्तव में किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा को सम्मान देने में सक्षम हैं?

 

यह एक और उदाहरण है जहां व्यवस्थाओं की गंभीर कमी और अधिकारी की लापरवाही के कारण मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।

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