Sunday, July 19

Opinion

पुरस्कारों का अर्थशास्त्र(सम्मान, कारोबार और साहित्य का संकट)
Opinion

पुरस्कारों का अर्थशास्त्र(सम्मान, कारोबार और साहित्य का संकट)

एक साहित्यिक संस्था ने कविता, कहानी, व्यंग्य सहित सात विधाओं में कुल 21 पुरस्कारों की घोषणा की। प्रत्येक विधा में प्रथम पुरस्कार ₹5,100, द्वितीय ₹3,100 तथा तृतीय ₹2,100 निर्धारित किया गया। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए ₹500 आवेदन शुल्क रखा गया और शर्त यह थी कि प्रतिभागी अपनी पिछले वर्ष प्रकाशित पुस्तक की दो प्रतियाँ आवेदन के साथ भेजें। आकर्षक घोषणा के बाद देशभर से 650 साहित्यकारों ने आवेदन किया, जिससे संस्था को आवेदन शुल्क के रूप में ₹3,25,000 प्राप्त हुए। निर्धारित तिथि पर वातानुकूलित सभागार में भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया गया, जिसमें कुल ₹72,100 की पुरस्कार राशि वितरित की गई तथा आयोजन पर लगभग ₹32,500 खर्च किए गए। इस प्रकार कुल व्यय ₹1,04,600 रहा, जबकि ₹2,20,400 की राशि शेष बच गई। अगले ही दिन संस्था के अध्यक्ष और सचिव को 1,300 पुस्तकें दान करने के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय द्वारा सम...
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अस्तित्व का संकट: क्या नए नेतृत्व के बिना वापसी संभव है?
BHOPAL, Editorial, INDORE, JABALPUR, Madhya Pradesh, Opinion, Politics, State, UJJAIN

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के अस्तित्व का संकट: क्या नए नेतृत्व के बिना वापसी संभव है?

विशेष राजनीतिक विश्लेषण मध्यप्रदेश की राजनीति में कभी कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर हुआ करती थी। एक समय था जब प्रदेश के अनेक जिले कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाते थे। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला है और आज कांग्रेस संगठनात्मक एवं चुनावी दोनों स्तरों पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। यदि हाल के चुनावी परिणामों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में भाजपा का प्रभाव लगातार मजबूत हुआ है। विधानसभा, लोकसभा, नगर निगम, नगर पालिका और पंचायत स्तर पर भी भाजपा ने व्यापक बढ़त बनाई है। प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में लंबे समय से भाजपा का मजबूत संगठन और जनाधार दिखाई देता है, जबकि कांग्रेस यहां लगातार कमजोर होती गई है। क्या पुराने नेतृत्व पर जनता का भरोसा कम हुआ है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव हारना नहीं, बल्कि...
मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘भूमि विवाद’ और मुख्यमंत्री की चुप्पी: क्या संकेत देती है यह स्थिति?
Editorial, INDORE, Madhya Pradesh, Opinion, State, UJJAIN

मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘भूमि विवाद’ और मुख्यमंत्री की चुप्पी: क्या संकेत देती है यह स्थिति?

विशेष राजनीतिक विश्लेषण मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिजनों से जुड़े कथित भूमि सौदों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है, वहीं विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और राजनीतिक बयानों के बाद भी मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से इस विषय पर सीमित सार्वजनिक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में कई तरह के प्रश्न उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री की चुप्पी राजनीतिक रणनीति है, या भाजपा नेतृत्व को अपने मुख्यमंत्री पर पूरा विश्वास है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी गंभीर आरोप पर दो प्रकार की रणनीतियां अपनाई जाती हैं। पहली, तत्काल सार्वजनिक स्पष्टीकरण देना। दूसरी, आरोपों को राजनीतिक मानते हुए उन्हें अधिक महत्व न देना। भाजपा फिलहाल दूसरे रास्ते पर चलती दिखाई देती...
मध्यप्रदेश में नशे के खिलाफ मुख्यमंत्री की मुहिम और कांग्रेस के सामने नई राजनीतिक चुनौती?
Editorial, Opinion

मध्यप्रदेश में नशे के खिलाफ मुख्यमंत्री की मुहिम और कांग्रेस के सामने नई राजनीतिक चुनौती?

क्या विपक्ष के एक बयान को भाजपा चुनावी मुद्दा बनाएगी? विशेष राजनीतिक विश्लेषण मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में नशे के विरुद्ध अभियान को सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है। राज्य सरकार लगातार अवैध मादक पदार्थों की तस्करी पर कार्रवाई, नशा मुक्ति अभियान, जनजागरूकता कार्यक्रम तथा युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए विशेष अभियान चला रही है। सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य प्रदेश को नशामुक्त बनाना और युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना है। मुख्यमंत्री कई मंचों से यह संदेश दे चुके हैं कि मध्यप्रदेश में नशे के कारोबार के प्रति "जीरो टॉलरेंस" की नीति अपनाई जाएगी। इसी बीच हाल ही में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के भाई नाना पटवारी से जुड़ा मामला राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया। मीडिया में सामने आए उनके सार्वजनिक बयान में उन्होंने स्वीकार किया कि वे एक...
मध्यप्रदेश भाजपा में आंतरिक असंतोष की आहट? नारोत्तम मिश्रा प्रकरण ने खड़े किए कई सवाल
Editorial, Madhya Pradesh, Opinion, State

मध्यप्रदेश भाजपा में आंतरिक असंतोष की आहट? नारोत्तम मिश्रा प्रकरण ने खड़े किए कई सवाल

लेखक : सच्‍चा दोस्त के मुख्य संपादक के राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित मध्यप्रदेश की राजनीति में हाल के दिनों में एक नया राजनीतिक विमर्श उभरता दिखाई दे रहा है। दतिया उपचुनाव में वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. नारोत्तम मिश्रा को टिकट न मिलने के बाद उनके समर्थकों द्वारा विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी और कथित नाराजगी ने भाजपा के भीतर चल रही संभावित आंतरिक खींचतान को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल स्थानीय स्तर की नाराजगी है, या फिर भाजपा के भीतर नेतृत्व, पद और भविष्य की भूमिका को लेकर कोई गहरा असंतोष पनप रहा है। हालांकि स्वयं डॉ. मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से इसे कार्यकर्ताओं की भावनात्मक प्रतिक्रिया बताया है और विवाद को शांत करने की कोशिश की है, लेकिन उनका अपेक्षाकृत शांत रुख भी राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। 30 वर्षों का राजनी...
महिला आरक्षण, लोकसभा सीटों का विस्तार और लोकतंत्र की कसौटी
Opinion

महिला आरक्षण, लोकसभा सीटों का विस्तार और लोकतंत्र की कसौटी

प्रतिनिधित्व बढ़े, लेकिन क्या जनता पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ? — डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी समावेशी भावना है। यह व्यवस्था केवल शासन चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रतिनिधित्व देने का संवैधानिक वादा भी है। महिलाओं की राजनीति में भागीदारी इसी वादे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम रही है। इसलिए महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का विचार स्वाभाविक रूप से स्वागत योग्य माना जाता है। यह केवल लैंगिक समानता का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का भी प्रश्न है। लेकिन महिला आरक्षण की इस ऐतिहासिक पहल के साथ एक नई बहस भी जन्म ले चुकी है। क्या महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने के लिए लोकसभा की कुल सीटों में भारी वृद्धि आवश्यक है? क्या मौजूद...
धर्मार्थ न्यासों की सामाजिक शक्ति
Opinion

धर्मार्थ न्यासों की सामाजिक शक्ति

- डॉ. प्रियंका सौरभ भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग तक अवसरों, संसाधनों और सुविधाओं की समान पहुँच सुनिश्चित करना है। जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है, तभी उसे समावेशी विकास कहा जाता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, किंतु केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होते। ऐसे में सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास (Public Charitable Trusts) समाज और राज्य के बीच एक प्रभावी सेतु के रूप में उभरते हैं। ये संस्थाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास तथा सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में कार्य कर भारत के विकास को अधिक समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास मूलतः ऐसे गैर-लाभकारी संगठन होते हैं जो किसी निजी लाभ के लिए नहीं, ब...
तिवाड़ी से भजनलाल तक – राजस्थान की राजनीति में संघर्ष बनाम किस्मत की कहानी
Opinion, Rajasthan, State

तिवाड़ी से भजनलाल तक – राजस्थान की राजनीति में संघर्ष बनाम किस्मत की कहानी

    जयपुर: राजस्थान की राजनीति में योग्यता और अनुभव के साथ-साथ भाग्य की भूमिका भी निर्णायक रही है। कई बार यह देखा गया है कि वर्षों का संघर्ष, संगठनात्मक क्षमता और जनता का भरोसा होने के बावजूद कुछ नेता अपेक्षित मुकाम तक नहीं पहुँच पाते, जबकि कुछ को कम समय में सत्ता का शिखर मिल जाता है।   राजस्थान की राजनीति इसका स्पष्ट उदाहरण पेश करती है। यहाँ घनश्याम तिवाड़ी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की राजनीतिक यात्रा दो बिल्कुल अलग कहानियां बयां करती हैं।   ब्राह्मण नेतृत्व का बदलता परिदृश्य   एक दौर ऐसा भी था जब राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा, दोनों दलों में प्रभावशाली ब्राह्मण नेता सक्रिय भूमिका में थे। उनके पास न केवल अपनी पार्टी में वर्चस्व था, बल्कि प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने की शक्ति भी। आज इस स्तर के नेतृत्व का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। मुख्यमंत्री पद मिल...
सोयाबीन एवं दलहन के आयात पर लगे रोक : किसानों के हित में कठोर नीति की मांग
Opinion

सोयाबीन एवं दलहन के आयात पर लगे रोक : किसानों के हित में कठोर नीति की मांग

उज्जैन। विदेशों से पाम तेल एवं तिलहनों के बढ़ते आयात से देश के तिलहन उत्पादक किसानों और ऑयल मिलों की कमर टूटती जा रही है। किसान जहाँ लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं आयातित तेल और दालें बाजार में भाव गिरा रही हैं। परिणामस्वरूप किसानों को उचित दाम नहीं मिल पा रहा और उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। सपाक्स पार्टी ने इस गंभीर मुद्दे को उठाते हुए केंद्र सरकार से आयात नीति में तत्काल सुधार की मांग की है। पार्टी के प्रवक्ता जे.आर. माहुरकर ने बताया कि सपाक्स पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक एवं पूर्व आईएएस डॉ. हीरालाल त्रिवेदी ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर किसानों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। किसानों को भाव नहीं, आयात को बढ़ावा डॉ. त्रिवेदी ने अपने पत्र में कहा है कि जैसे ही सोयाबीन, तिलहन या दलहन फसलों के भाव बढ़ने की संभावना होती है, के...
एकांत का सौंदर्य और भीतर की यात्रा
Opinion

एकांत का सौंदर्य और भीतर की यात्रा

आज का मनुष्य सफलता, दिखावे और अपेक्षाओं की भागदौड़ में इतना उलझ गया है कि अपने भीतर झांकने का समय ही खो चुका है। तेज़ रफ्तार आधुनिक जीवन ने हमें बाहरी दुनिया से तो जोड़ा है, पर हमारे आंतरिक संसार को हमसे दूर कर दिया है। ऐसे समय में ‘एकांत’ किसी विलासिता का नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य का मूल आधार बन गया है। भीतर की शांति ही जीवन की दिशाजब मन शांत होता है, तभी जीवन की राह स्पष्ट होती है। लक्ष्यहीन भटकाव केवल थकाता है, प्रेरित नहीं करता। एकांत मन की गहराइयों को रोशन करने वाला दीपक है, जबकि ध्यान और अध्ययन उस रोशनी को दिशा देने वाले दो सशक्त स्तंभ हैं। ध्यान व्यक्ति को स्थिर करता है और अध्ययन उसे विस्तार देता है। दोनों मिलकर जीवन में अनुशासन, सृजनशीलता और उद्देश्य का संचार करते हैं। एकांत का अर्थ समाज से दूरी नहींमनुष्य सामाजिक प्राणी है। लोगों के बीच रहना, बातचीत करना जीव...