
नई दिल्ली: 2026 के दावोस वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में इस साल ब्रिक्स+ के भीतर पहली बार खुलकर मतभेद नजर आए। विस्तार की तेज़ी के बावजूद समूह के भीतर सदस्य देशों के हित टकराने लगे हैं, जिससे रणनीतिक संकट गहराने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि BRICS+ का मौजूदा स्वरूप उसकी मूल भूमिका और लक्ष्य को पूरा करने में असमर्थ साबित हो रहा है।
विस्तार के बावजूद दरारें
ब्रिक्स+ में चीन, रूस और भारत की अलग-अलग प्राथमिकताएं सबसे बड़ी चुनौती बन गई हैं। चीन इस समूह का आर्थिक इंजन बनकर डॉलर को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है, जबकि रूस अपनी सैन्य क्षमता को बनाए रखने और विस्तार देने में जुटा है। वहीं भारत मल्टी-अलाइनमेंट नीति पर जोर देते हुए किसी भी देश को नेतृत्व की भूमिका में स्वीकार नहीं कर रहा।
विशेषज्ञ बताते हैं कि 2024 के बाद BRICS का विस्तार ब्रिक्स+ में कई नए देशों—जैसे ईरान, मिस्र, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब—को शामिल करके हुआ, जिससे अंदरूनी एकजुटता कमजोर हुई और निर्णय लेने में जटिलता बढ़ गई।
अमेरिका की खुशी का कारण
ब्रिक्स+ का मकसद विश्व की आर्थिक व्यवस्था को डॉलर से अलग करना था। लेकिन सदस्य देशों के विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक हितों के कारण सामूहिक सहमति बनाना मुश्किल होता जा रहा है। वहीं, अमेरिकी प्रशासन इस स्थिति का फायदा उठा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (BoP) मॉडल, जिसमें निर्णय त्वरित और केंद्रीकृत तरीके से लिए जाते हैं, ब्रिक्स+ की धीमी प्रक्रिया और मतभेदों के मुकाबले अमेरिका को रणनीतिक बढ़त देता है।
क्रॉसविंड्स और आर्थिक टकराव
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की करेंसी डॉलर से जुड़ी होने के कारण ये ब्रिक्स+ की नई करेंसी योजना के खिलाफ हैं। भारत नए पेमेंट सिस्टम का प्रस्ताव रखता है, जबकि चीन और रूस डी-डॉलराइजेशन चाहते हैं। इस तरह ब्रिक्स+ की एकजुटता टूट रही है, और उसका उद्देश्य—वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में प्रभाव बढ़ाना—भटकने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS+ का विस्तार ऐतिहासिक था, लेकिन अब यह स्ट्रैटेजिक कमजोरी बनकर सामने आ रहा है। विभिन्न आर्थिक हितों और वैश्विक भू-राजनीतिक टकरावों के बीच सदस्य देशों को सामूहिक निर्णय पर पहुंचना असंभव सा लग रहा है।
