Monday, February 9

राजस्थान: रामगढ़ क्रेटर के 650 करोड़ साल पुराने रहस्य का खुलासा, वैज्ञानिकों को मिले उल्कापिंड के अंश

बारां (Rajasthan): राजस्थान के बारां जिले में स्थित प्राचीन रामगढ़ क्रेटर फिर से वैज्ञानिकों की चर्चा में आ गया है। ताजा अध्ययन में इस 650 करोड़ साल पुराने क्रेटर से मिले सूक्ष्म चुंबकीय कणों ने प्राचीन उल्कापिंड टकराव के रहस्य को उजागर किया है।

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मिट्टी में मिले माइक्रोटेक्टाइट्स जैसे कण

वैज्ञानिकों ने क्रेटर की दो उथली खाइयों से लगभग 30 मिट्टी के नमूने लिए और उनका विश्लेषण किया। इसमें चुंबकीय तकनीक का इस्तेमाल कर सूक्ष्म कण अलग किए गए। माइक्रोस्कोप और रासायनिक उपकरणों से इन कणों का अध्ययन करने पर पाया गया कि कई कण एक मिलीमीटर से भी छोटे, चिकने और गोलाकार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये कण उस समय बने होंगे जब उल्कापिंड के टकराने से चट्टानें पिघलकर हवा में उछलीं और तेजी से ठंडी होकर जम गईं।

रासायनिक विश्लेषण में लोहे और निकल की उपस्थिति

अध्ययन में कई कणों में लोहा, निकल और सिलिकॉन पाए गए। विशेष रूप से निकल की मौजूदगी वैज्ञानिकों के लिए अहम है, क्योंकि यह सामान्य रूप से रामगढ़ क्षेत्र की बलुआ पत्थर चट्टानों में लगभग नहीं पाया जाता। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह कण उस उल्कापिंड से संबंधित हो सकते हैं जिसने क्रेटर बनाया।

लोहे से भरपूर उल्कापिंड की संभावना

कुछ नमूनों में अत्यधिक लौह तत्व और लौह-समृद्ध खनिज संरचनाएं भी देखी गई हैं। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि रामगढ़ क्रेटर का निर्माण लोहे से भरपूर उल्कापिंड के टकराव के कारण हुआ था। शोधकर्ता बताते हैं कि ऐसे उल्कापिंड अक्सर वाष्पीकृत हो जाते हैं, इसलिए उनके सीधे प्रमाण मिलना मुश्किल होता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से क्रेटर का महत्व

वैज्ञानिकों के अनुसार यह अध्ययन न केवल पृथ्वी की सतह पर उल्कापिंड प्रभाव को समझने में मदद करता है, बल्कि सौरमंडल के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य भी उजागर करता है। आगे के अध्ययन से टकराव के समय और उल्कापिंड की प्रकृति के बारे में और अधिक स्पष्ट जानकारी मिल सकती है।

यह शोध LPSC 2026 (Lunar and Planetary Science Conference) में प्रस्तुत किया गया और इसे उल्कापिंड वैज्ञानिक समुदाय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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