
रायपुर। देश से माओवाद खत्म करने के लिए सरकार द्वारा तय की गई 31 मार्च 2026 की डेडलाइन अब बेहद करीब आ चुकी है। छत्तीसगढ़ के बीजापुर सहित बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की नई सरेंडर-कम-पुनर्वास नीति के चलते बड़ी संख्या में माओवादी आत्मसमर्पण कर रहे हैं।
हालांकि, तमाम प्रयासों के बावजूद कुछ कुख्यात नक्सली कमांडर अब भी जंगलों में सक्रिय हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है।
सरेंडर करने वालों को हुनर सिखाकर जोड़ा जा रहा मुख्यधारा से
बीजापुर में बनाए गए सरेंडर कैंप में नवंबर 2025 में हथियार छोड़ने वाले 40 पुरुष और 40 महिलाएं रह रहे हैं। इन पूर्व नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए ड्राइविंग, सिलाई, राजमिस्त्री और अन्य रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कैंप में उन्हें रहने, खाने और मनोरंजन की भी सुविधाएं दी गई हैं, ताकि वे सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।
पूर्व नक्सलियों ने बताई बंदूक उठाने की वजह
सरेंडर कर चुके कई पूर्व नक्सलियों ने बताया कि वे टॉर्चर, उत्पीड़न और सलवा जुडूम जैसी परिस्थितियों से परेशान होकर माओवादी संगठन में शामिल हुए थे।
पूर्व डिविजनल कमांडर मासो टैमो उर्फ समीर ने बताया कि 2005 में शुरू हुए सलवा जुडूम आंदोलन ने उसके गांव को तबाह कर दिया, जिससे उसने हथियार उठा लिया।
वहीं महिला कैडर जोगी माधवी ने कहा कि पुलिस द्वारा गलत तरीके से फंसाए जाने के बाद उसने माओवादियों का साथ चुना था। अब वह सिलाई सीखकर परिवार के पास लौटना चाहती है।
आर्थिक सहायता पर ‘लॉक-इन पीरियड’
बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. ने बताया कि आत्मसमर्पण करने वालों की जांच के लिए स्क्रीनिंग कमेटी बनाई गई है। उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता को तीन साल के लॉक-इन पीरियड में रखा जाता है, ताकि धन का इस्तेमाल दोबारा माओवादी गतिविधियों में न हो सके।
सरेंडर के बाद पूर्व नक्सलियों को 1 से 3 महीने के ट्रांजिट कैंप में रखा जाता है, जहां आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज तैयार किए जाते हैं।
जंगलों में अब भी सक्रिय हैं ये 5 टॉप नक्सली
सरकार के दावों और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई के बावजूद कुछ बड़े नक्सली नाम अब भी सक्रिय हैं। इनमें शामिल हैं—
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थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी
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मुप्पल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति (पूर्व महासचिव)
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मिसिर बेसरा (झारखंड प्रभारी)
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मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम
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पप्पा राव उर्फ मोंगू
आईजी सुंदरराज के अनुसार, CPI (Maoist) संगठन की स्थिति अब कमजोर हो चुकी है। संगठन का जनता से संपर्क टूट रहा है और वे मुखबिर के शक में आम नागरिकों की हत्या तथा अवैध वसूली जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।
सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत, FOBs का दायरा बढ़ाया
माओवाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों ने अपनी मौजूदगी और मजबूत कर दी है। पहले जहां फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) 5 किलोमीटर के दायरे में बनाए जाते थे, अब उन्हें बढ़ाकर 10 किलोमीटर तक कर दिया गया है।
साल 2025 में 58 नए FOBs स्थापित किए गए, जिनकी मदद से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में संयुक्त टास्क फोर्स (JTFs) को बड़ी सफलता मिली है।
आगे की रणनीति
अधिकारियों का मानना है कि शांति स्थापित होने के बाद इन इलाकों में स्थायी पुलिस स्टेशन और स्थानीय पुलिस की तैनाती आवश्यक होगी। योजना के तहत 2-3 कैंपों के बीच पुलिस स्टेशन स्थापित किए जाएंगे, साथ ही FOBs को भी सक्रिय बनाए रखा जाएगा।
निष्कर्ष
एक तरफ सरकार की माओवाद खत्म करने की डेडलाइन बेहद करीब है, वहीं दूसरी तरफ कुछ बड़े नक्सली नाम अब भी सक्रिय रहकर सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने हुए हैं। आने वाले दिनों में माओवादी नेटवर्क के अंतिम सफाए के लिए सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और तेज होने की संभावना है।