
इस्लामाबाद: पाकिस्तान पर कर्ज का बोझ अब नियंत्रण से बाहर निकल चुका है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का सार्वजनिक कर्ज संसद द्वारा तय सीमा 56% को पार कर जीडीपी के 70.7% तक पहुँच गया है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, और अब केंद्रीय बजट का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ कर्ज की अदायगी में खर्च हो रहा है।
कर्ज की सीमा पार, वित्तीय अनुशासन टूटा
कराची स्थित अखबार बिजनेस रिकॉर्डर में प्रकाशित ‘डेट पॉलिसी स्टेटमेंट 2026’ के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में पाकिस्तान का सार्वजनिक कर्ज वैधानिक सीमा से 16.8 ट्रिलियन रुपये अधिक हो गया। यह स्थिति सरकार की वित्तीय अनुशासन लागू करने में लगातार नाकामी को दर्शाती है।
लेख में कहा गया है कि पाकिस्तान की शासन व्यवस्था में गहरी संरचनात्मक खामियां हैं, जहाँ खर्च पहले किया जाता है और बाद में उसे पूरा करने के लिए और अधिक कर्ज लिया जाता है। आमतौर पर संसद को कर्ज और घाटे के बारे में जानकारी तब दी जाती है जब सीमा पहले ही पार हो चुकी होती है।
कर्ज चुकाने में आधा बजट, विकास योजनाएं प्रभावित
पाकिस्तानी बजट का लगभग आधा हिस्सा अब सिर्फ कर्ज अदायगी में जा रहा है। इससे विकास परियोजनाओं के लिए धन सीमित हो गया है और जनता पर करों का बोझ बढ़ रहा है। पिछले तीन वर्षों में घरेलू कर्ज की अदायगी सरकारी खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण बनी है, जिससे अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी निवेश और विकास योजनाएं प्रभावित हुई हैं।
सरकार का दावा है कि वह वित्तीय जिम्मेदारी निभाने और कर्ज सीमा कानून का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। वित्त मंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि धीरे-धीरे राजकोषीय घाटा घटाकर सार्वजनिक कर्ज को टिकाऊ स्तर पर लाया जाएगा।
आंकड़े बयां कर रहे गंभीर सच
हालांकि सरकार सुधारों की बात कर रही है, चालू वित्त वर्ष के शुरुआती संकेत उत्साहजनक नहीं हैं। फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (एफबीआर) जुलाई से जनवरी तक अपने राजस्व लक्ष्य से 347 अरब रुपये पीछे रहा, जबकि सरकार कर्ज के दबाव को कम दिखाने के लिए वित्तीय इंजीनियरिंग पर अधिक निर्भर होती जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पाकिस्तान ने तत्काल आर्थिक सुधार नहीं किए, तो कर्ज का बोझ देश की अर्थव्यवस्था के लिए लंबी अवधि में गंभीर संकट पैदा कर सकता है।