
रियाद: तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने रियाद में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) से मुलाकात की। इस दौरे ने न केवल दुनिया का ध्यान खींचा, बल्कि खासतौर से पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हुआ। पाकिस्तान की कोशिश थी कि तुर्की को अपने और सऊदी अरब के रक्षा समझौते में शामिल कर ‘इस्लामिक नाटो’ का निर्माण किया जाए। लेकिन एर्दोगन ने पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए सीधे एमबीएस से बातचीत की।
तुर्की-सऊदी रक्षा समझौते पर जोर
मुलाकात के बाद जारी जॉइंट डिक्लेरेशन में दोनों देशों ने मौजूदा रक्षा सहयोग समझौतों को सक्रिय करने और क्षेत्रीय सुरक्षा व स्थिरता को मजबूत करने पर सहमति जताई। इसके अलावा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और साइबर सुरक्षा मामलों में मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता भी सामने आई।
प्रतिद्वंद्वी से सहयोगी बने सऊदी-तुर्की
यह एर्दोगन की दो साल में पहली रियाद यात्रा है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में निरंतर सुधार हुआ है। राजनयिक सहयोग से लेकर अब रक्षा समझौते तक दोनों देशों ने आपसी भरोसे और सहयोग को बढ़ाया है।
पाकिस्तान के लिए झटका
जुलाई 2023 के बाद यह पहली यात्रा थी और इस दौरान तुर्की ने स्पष्ट किया कि वह पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौते में शामिल नहीं होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, एर्दोगन की यह यात्रा पाकिस्तान की ‘इस्लामिक नाटो’ की योजना को कमजोर करती है।
तुर्की के लिए संतुलन चुनौती
यूके के बर्मिंघम विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ उमर करीम का कहना है कि तुर्की को सऊदी के साथ किसी भी समझौते में अन्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना होगा। इस यात्रा ने साफ कर दिया कि यूएई और इजरायल से सुरक्षा संबंधों को ध्यान में रखते हुए सऊदी अरब तुर्की पर भरोसा कर सकता है।
तनावपूर्ण इतिहास के बावजूद सुधार
अक्टूबर 2018 में इस्तांबुल में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद तुर्की-सऊदी संबंध तनावपूर्ण हो गए थे। पिछले दो साल में दोनों देशों ने आपसी मतभेदों को कम किया और अब रक्षा सहयोग के क्षेत्र में नई शुरुआत की है।