Thursday, May 14

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भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौता: यूरोप में भारतीय उद्योग के लिए खुले पांच बड़े रास्ते

 

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नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के बाद भारतीय उद्योगों के लिए यूरोप में प्रवेश के नए अवसर खुल गए हैं। 27 यूरोपीय देशों ने भारत के लिए अपने बाजारों के दरवाजे खोले हैं। इस समझौते के तहत यूरोपीय यूनियन ने भारत को कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर पांच अहम आश्वासन दिए हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

 

पहला आश्वासन: CBAM में भारत को भी मिलेगी छूट

यूरोपीय संघ ने भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन जैसे दर्जे का भरोसा दिया है। इसके तहत यदि भविष्य में किसी अन्य देश को CBAM से जुड़ी कोई नई छूट दी जाती है, तो वही छूट भारत को भी दी जाएगी।

 

दूसरा आश्वासन: भारत–ईयू तकनीकी संवाद शुरू होगा

CBAM से जुड़े सभी तकनीकी पहलुओं में पारदर्शिता लाने के लिए भारत और ईयू के बीच जल्द ही एक तकनीकी कार्य समूह और नियमित संवाद की शुरुआत होगी। इसमें कार्बन उत्सर्जन की गणना, शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया और फॉर्मूले को स्पष्ट किया जाएगा।

 

तीसरा आश्वासन: सत्यापन तंत्र में भारतीय संस्थाओं की भागीदारी

यूरोपीय संघ ने CBAM के सत्यापन तंत्र में भारतीय संस्थाओं को शामिल करने पर सहमति जताई है। इससे भारतीय उद्योगों को केवल यूरोप स्थित एजेंसियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और लागत भी कम होगी, खासकर छोटे एवं मध्यम उद्यमों को राहत मिलेगी।

 

चौथा आश्वासन: दोहरे कर से बचाव

भारत द्वारा लागू की जा रही कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के तहत लगाए जाने वाले शुल्कों को CBAM के उद्देश्यों के लिए मान्यता दी जाएगी। इससे भारतीय उत्पादों पर दोहरा कर या शुल्क नहीं लगेगा।

 

पांचवां आश्वासन: निरंतर संवाद की व्यवस्था

भारत और यूरोपीय संघ ने यह सहमति जताई है कि CBAM कोई कठोर ढांचा नहीं होगा, बल्कि समय-समय पर उत्पन्न होने वाली चिंताओं को सुलझाने के लिए एक जीवंत और सतत संवाद की प्रक्रिया जारी रहेगी।

 

CBAM का उद्देश्य और भारत पर प्रभाव

EU-CBAM का मुख्य उद्देश्य आयातित और घरेलू उत्पादों पर समान कार्बन लागत लागू कर कार्बन लीकेज को रोकना और वर्ष 2050 तक जलवायु तटस्थता हासिल करना है। उर्वरक, हाइड्रोजन, बिजली, लोहा-इस्पात, सीमेंट और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्र इसके दायरे में आते हैं। विशेष रूप से भारतीय लौह एवं इस्पात उद्योग पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यूरोपीय संघ को भारत के कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।

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