
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता, जिसे “मदर ऑफ आल डील्स” कहा गया है, अमेरिका के ट्रंप प्रशासन को रास नहीं आया है। यह समझौता दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच साझेदारी को मजबूत करता है, जिनका वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सा लगभग 25% है।
अमेरिका ने पिछले कुछ समय से भारत पर 50% टैरिफ लागू किया हुआ है। अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने संकेत दिए हैं कि भारत को टैरिफ में जल्द राहत नहीं मिलने वाली। उन्होंने कहा कि रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका की चिंताओं को दूर करने और टैरिफ छूट पाने के लिए भारत को अभी और कदम उठाने होंगे।
ग्रीर ने फॉक्स बिजनेस को इंटरव्यू में कहा, “नई दिल्ली ने रूसी तेल की खरीद कम करने में प्रगति की है, लेकिन सप्लाई से छुटकारा पाना मुश्किल है क्योंकि उन्हें रूस से मिलने वाला डिस्काउंट आकर्षक लगता है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत की रूस से तेल खरीद पर लगातार नजर रख रहा है, और उनके हालिया दावे कि भारत ने रूस से तेल की खरीद लगभग बंद कर दी है, सही नहीं हैं।
इस बयान के ठीक बाद, भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड डील का ऐलान हुआ। ग्रीर ने इस डील को ट्रंप प्रशासन की टैरिफ और ट्रेड पॉलिसी का सीधा जवाब बताया। उन्होंने कहा कि भारत को यूरोपीय बाजार में अधिक अवसर मिलेंगे और यह समझौता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदे का सौदा साबित होगा।
कुछ ही दिन पहले अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने दावोस इकोनॉमिक फोरम में संकेत दिया था कि रूसी तेल पर भारत से लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ को हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा था, “भारतीय रिफाइनरियों से खरीदारी कम होने के कारण यह टैरिफ सफलता के साथ लागू हुआ। अभी भी 25% टैरिफ लागू है, लेकिन हटाने का रास्ता खुला है। यह एक बड़ी सफलता है।”
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान भारत और यूरोपीय संघ की नई फ्री ट्रेड डील और अमेरिका की रूसी तेल नीति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश माना जा रहा है।