नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन के चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने के फैसले को “बहुत बड़ी मूर्खता” बताया है। यह बयान भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक संबंधों में नया तनाव पैदा कर सकता है, क्योंकि भारत हमेशा से मॉरीशस की संप्रभुता का समर्थक रहा है।
चागोस द्वीप समूह का बैकग्राउंड
चागोस द्वीप समूह मूलतः मॉरीशस का हिस्सा था, लेकिन 1965 में ब्रिटेन ने इसे अलग कर दिया।
सबसे बड़ा द्वीप डिएगो गार्सिया अमेरिका-ब्रिटेन सैन्य अड्डे के लिए लीज पर दिया गया।
2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने ब्रिटेन के नियंत्रण को अवैध माना और द्वीपों को मॉरीशस को लौटाने की सिफारिश की।
अक्टूबर 2024 में ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने पर सहमति जताई।
ट्रंप का बयान और उसकी अहमियत
ट्रंप ने ब्रिटेन के फैसले को “बहुत बड़ी मूर्खता” करार दिया।
उनका कहना है कि ब्रिटेन का यह कदम अमेरिका के ग्रीनलैंड को लेने के इरादों में भी शामिल था।
पहले अमेरिका ने ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए समझौते का समर्थन किया था।
भारत के लिए चागोस का महत्व
चागोस द्वीप समूह के मिलने से मॉरीशस का सागर क्षेत्र (EEZ) काफी बढ़ जाएगा, जो लगभग 2.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर है।
भारत मॉरीशस के EEZ में जल सर्वेक्षण में मदद करेगा।
मॉरीशस चागोस तक पहुँचने के लिए भारतीय जहाज का उपयोग करेगा और वहां अपना झंडा फहराएगा।
भारत-मॉरीशस के मजबूत रक्षा संबंध हैं और भारत इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते हितों और ब्रिटेन की उपस्थिति पर भी नजर रख सकता है।
भारत पोर्ट लुई के पुनर्विकास में भी सहयोग कर रहा है।
भू-राजनीतिक और कूटनीतिक असर
चागोस द्वीप समूह में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा हिंद महासागर में अमेरिका और ब्रिटेन के लिए महत्वपूर्ण है।
ट्रंप की टिप्पणी भारत-अमेरिका संबंधों में नया मोड़ ला सकती है।
यह मामला अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के मुद्दों को भी उजागर करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मॉरीशस के चागोस द्वीप समूह पर नियंत्रण से दक्षिण-पश्चिमी हिंद महासागर में रणनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। भारत की भूमिका केवल सैन्य निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और समुद्री क्षेत्रीय सहयोग को भी मजबूत करती है।