Wednesday, January 21

पीएम मोदी ने पहले ही भांप लिया, दुनिया ट्रंप के जाल में फंसती रही

नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में भी वैसा ही अनिश्चित और अप्रत्याशित व्यवहार कर रहे हैं, जैसा उनके पहले कार्यकाल में देखा गया। दोस्त और दुश्मन उनके लिए एक समान हैं, और वे अपनी मर्जी के मुताबिक रिश्तों को बदलने में कोई हिचक नहीं दिखाते। यूरोप के देश, ग्रीनलैंड पर उनके विस्तारवादी इरादों से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, जबकि चीन जैसे राष्ट्र भी अमेरिकी दखलअंदाजी के सामने बौने नजर आए।

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लेकिन इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक समझ ने भारत को ट्रंप के जाल से बचा लिया। भारत-अमेरिका संबंध आज सबसे बेहतर स्थिति में हैं, और पीएम मोदी ने ट्रंप की अनियंत्रित बयानबाजी के बावजूद रणनीतिक चुप्पी और सधे हुए कदमों के जरिए देशहित की रक्षा की।

ट्रंप की चुनौती, यूरोप की परेशानी
ट्रंप ने पहले वेनेजुएला में दबदबा दिखाया और वहां की विपक्षी नेता को नोबेल पीस प्राइज वाला मेडल भेंट किया। ग्रीनलैंड पर जब विवाद बढ़ा, तो ट्रंप ने यूरोपीय नेताओं के प्राइवेट संदेश सार्वजनिक करने से भी पीछे नहीं हटे। फ्रांस, ब्रिटेन और नाटो प्रमुख ट्रंप की दोस्ती की अस्थिरता का शिकार हुए।

पीएम मोदी की चतुराई
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-अमेरिका व्यापार और रणनीतिक संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया। ट्रंप के आमंत्रण और सार्वजनिक बयानों के बावजूद उन्होंने संयम बनाए रखा। उदाहरण के लिए, कनाडा से लौटते समय ट्रंप के वाशिंगटन बुलावे को मोदी ने सम्मानपूर्वक अस्वीकार किया। देशहित में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा गया और भारत ने अपनी नीतियों में कोई समझौता नहीं किया।

भारत ने अमेरिका से कूटनीति नहीं छोड़ी
हालांकि ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने के बहाने भारत पर 50% टैरिफ लगाया और पाकिस्तान पर 19% टैरिफ रखे, भारत ने धैर्य बनाए रखा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अमेरिकी प्रशासन से लगातार संपर्क बनाए रखा और व्यापारिक समझौते पर बातचीत जारी रखी। इसी दौरान भारत ने यूरोपीय संघ के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार संधि (FTA) पर भी चर्चा की, जिसे 27 जनवरी को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के रूप में घोषित किया जाएगा।

संक्षेप में:
पीएम मोदी ने ट्रंप की मनमानी और बयानबाजी के बावजूद कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। न तो भारत ने पाकिस्तान की तरह ट्रंप की चापलूसी की और न ही अमेरिकी दालों पर टैरिफ लगाने में कोई संकोच किया। ग्रीनलैंड विवाद और यूरोप के साथ अमेरिका के संबंधों में गिरावट साफ दिखाती है कि भारत की रणनीति सफल रही।

 

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