
चंडीगढ़: सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ की मशहूर सुखना झील के लगातार सूखने और खराब होते जलस्तर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। चीफ जस्टिस एन. वी. सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अधिकारियों और बिल्डर माफिया की मिलीभगत के कारण झील पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है। बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने हरियाणा सरकार को चेतावनी देते हुए कहा, “आप सुखना झील को कितना सुखाओगे? यह झील कभी चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटन केंद्र थी, लेकिन लगातार गिरते जलस्तर ने इसके अस्तित्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।”
अरावली पहाड़ियों पर विशेषज्ञ समिति का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन से संभावित अपूरणीय क्षति को देखते हुए अरावली पहाड़ियों और आसपास के क्षेत्रों में खनन गतिविधियों की व्यापक और समग्र जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्णय लिया। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और न्यायमित्र के. परमेश्वर को चार सप्ताह के भीतर विशेषज्ञ पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के नाम सुझाने का निर्देश दिया।
बेंच ने कहा कि यह समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन और निगरानी में काम करेगी। साथ ही, अदालत ने पिछले आदेशों को भी विस्तारित किया जिसमें अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को लेकर जारी 20 नवंबर के निर्देशों को स्थगित रखा गया था।
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर विवाद
अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर विवाद बढ़ने के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने कहा कि कुछ संकटास्पद अस्पष्टताओं का समाधान आवश्यक है, जैसे कि 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी के मानक के कारण अरावली का बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण से बाहर हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को यह निर्देश दिया था कि अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को मान्यता दी जाए और विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में नए खनन पट्टों पर रोक लगाई जाए।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और अरावली क्षेत्र में खनन पर कड़ी निगरानी सुखना झील और पर्यावरण संरक्षण के लिए निर्णायक साबित होगी। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट आने तक, झील और आसपास के क्षेत्र की सुरक्षा सर्वोपरि रहेगी।