
पटना: शंभू गर्ल्स हॉस्टल में छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले ने पुलिस की संवेदनशीलता और जांच प्रक्रिया पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र में हुई यह घटना 6 जनवरी को हुई थी, लेकिन पुलिस की निष्क्रियता और जांच के तरीकों ने परिजनों में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है।
परिजनों का आरोप है कि थाना इंचार्ज रोशनी कुमारी ने मामले में 72 घंटे तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। छात्रा को 6 जनवरी को बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाया गया था, और उसी दिन अस्पताल ने पुलिस को सूचना भी दी थी। बावजूद इसके, 6, 7 और 8 जनवरी तक पुलिस खामोश रही। परिजनों ने तब एफआईआर दर्ज कराई जब 9 जनवरी को डॉक्टर ने चुपके से कहा कि छात्रा के साथ कुछ गलत हुआ है।
जांच प्रक्रिया में उठे सवाल
सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि पुलिस ने स्वयं मौके पर जाने की बजाय अपने प्राइवेट ड्राइवर को हॉस्टल भेजा और वहां से सीसीटीवी फुटेज व डीवीआर उठा लाने को कहा। ड्राइवर ने स्टिंग में स्वीकार किया कि एसएचओ को हॉस्टल का पता नहीं था, इसलिए उन्हें भेजा गया। इससे सवाल उठ रहे हैं कि 72 घंटे बाद फुटेज सुरक्षित थे या उसमें छेड़छाड़ हो सकती थी।
‘सुसाइड थ्योरी’ पर अड़े अधिकारी
11 जनवरी को छात्रा की मौत के बाद पुलिस पर बढ़ते दबाव के बीच एएसपी अभिनव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि कमरे में नींद की गोलियां मिली हैं और यह आत्महत्या का मामला है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक अधिकारी इस थ्योरी पर कायम रहे। परिजनों का कहना है कि अगर यह आत्महत्या थी तो शरीर पर चोट के निशान क्यों थे।
साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका
परिजन और स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस और हॉस्टल प्रबंधन के बीच साठगांठ हो सकती है। 72 घंटे के अंतराल में कमरे की सफाई और डीवीआर का अनधिकृत व्यक्ति द्वारा जब्त करना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी रसूखदार को बचाने के लिए जानबूझकर जांच में ढिलाई बरती गई।
इस मामले ने बिहार पुलिस की संवेदनशीलता और जांच की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों की उम्मीद है कि उच्च अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और सच्चाई सामने आएगी।