
नई दिल्ली।
भारतीय खेल जगत की सबसे चमकदार हस्तियों में शामिल और पूर्व विश्व नंबर-1 बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने सोमवार को पेशेवर खेल से संन्यास लेने की औपचारिक घोषणा कर दी। उनके इस फैसले के साथ ही भारतीय बैडमिंटन के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया। साइना ने साफ किया कि घुटनों की पुरानी चोट, कार्टिलेज के पूरी तरह खराब हो जाने और गठिया (आर्थराइटिस) जैसी गंभीर चिकित्सीय समस्याओं ने उन्हें यह कठिन फैसला लेने के लिए मजबूर कर दिया।
घुटनों की तकलीफ बनी सबसे बड़ी वजह
अपने संन्यास के कारणों पर खुलकर बात करते हुए साइना ने बताया कि उच्च स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए रोजाना 8–9 घंटे की कड़ी ट्रेनिंग जरूरी होती है, लेकिन उनकी मौजूदा शारीरिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती।
साइना ने कहा,
“मेरे घुटनों का कार्टिलेज पूरी तरह खराब हो चुका है। एक-दो घंटे की ट्रेनिंग के बाद ही सूजन आ जाती है। मैंने अपने माता-पिता और कोच को साफ कह दिया था कि अब इसे आगे खींचना संभव नहीं है।”
खामोशी से लिया विदाई का फैसला
गौरतलब है कि साइना ने पिछले करीब दो वर्षों से किसी भी पेशेवर टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लिया था। उनका आखिरी अंतरराष्ट्रीय मुकाबला 2023 सिंगापुर ओपन रहा। संन्यास की औपचारिक घोषणा में हुई देरी पर उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भी अपनी शर्तों पर की और अंत भी उसी तरह करना चाहती थीं।
“मुझे लगा कि अलग से घोषणा करना जरूरी नहीं है। लोग खुद समझ जाएंगे कि अब मैं कोर्ट पर नजर नहीं आऊंगी।”
रियो ओलंपिक की चोट बनी करियर का टर्निंग पॉइंट
साइना के करियर में 2016 रियो ओलंपिक के दौरान लगी घुटने की चोट एक बड़ा मोड़ साबित हुई। इस चोट ने उनकी निरंतरता को प्रभावित किया, लेकिन उनके जज्बे में कोई कमी नहीं आई।
उन्होंने 2017 विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक और 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर शानदार वापसी की। हालांकि, बार-बार उभरने वाली घुटनों की समस्या अंततः उनके करियर पर भारी पड़ गई।
भारतीय बैडमिंटन की प्रेरणा बनीं साइना
साइना नेहवाल न केवल भारत की पहली महिला विश्व नंबर-1 बनीं, बल्कि उन्होंने बैडमिंटन को देश के घर-घर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी उपलब्धियों ने अनगिनत युवा खिलाड़ियों को इस खेल की ओर प्रेरित किया।
आज भले ही साइना नेहवाल ने कोर्ट को अलविदा कह दिया हो, लेकिन उनकी विरासत भारतीय खेल इतिहास में हमेशा अमर रहेगी।