
झारखंड के डुमका जिले के मनीष कुमार की कहानी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। बचपन से ही जंगल और प्रकृति से लगाव रखने वाले मनीष ने शहर की भव्य आईटी नौकरी छोड़कर फॉरेस्ट ऑफिसर बनने का रास्ता चुना।
प्रकृति से पहला परिचय पिता के जरिए
मनीष के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। वे कई बार फॉरेस्ट ऑफिसर्स के सहायक के तौर पर जंगल जाते थे और अपने बेटे को भी अक्सर साथ ले जाते थे। जंगल की हर चीज को करीब से देखने और समझने का मौका मनीष को पिता के साथ मिला। यही अनुभव उनके अंदर प्रकृति के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ।
इंजीनियरिंग में करियर बनाने का सपना
मनीष ने जमशेदपुर के RVS कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में बीटेक किया। पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने कुछ समय फाइनेंस कंपनी में और फिर TCS में नौकरी शुरू की।
मन की शांति के लिए छोड़ दी TCS की नौकरी
TCS में काम करते हुए मनीष को महसूस हुआ कि शहर की दौड़-भाग वाली जिंदगी और परिवार से दूर रहना उनके लिए सही नहीं। महज एक महीने में नौकरी छोड़ दी। मनीष ने कहा, “मुझे एहसास हुआ कि टेक कर्मचारी की जिंदगी मेरे लिए नहीं थी। मानसिक शांति मेरे लिए ज्यादा जरूरी थी।”
सरकारी नौकरी की तैयारी की शुरुआत
घर लौटने के बाद मनीष ने सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की। पिता ने उनका पूरा समर्थन किया। उन्होंने ऑनलाइन और यूट्यूब के जरिए पढ़ाई की और झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा निकाली गई सहायक वन संरक्षक (ACF) और वन रेंज अधिकारी (FRO) की भर्ती में आवेदन किया।
छह महीने की तैयारी के बाद फॉरेस्ट ऑफिसर बने मनीष
छह महीने की कड़ी तैयारी के बाद मनीष सब-बीट ऑफिसर यानी फॉरेस्टर बन गए। अब वे न सिर्फ अपने परिवार के साथ हैं, बल्कि जंगल और वन्य जीवों की सुरक्षा, क्राइम नियंत्रण और इको-टूरिज्म के क्षेत्र में भी योगदान दे रहे हैं। मनीष मसानजोर बांध के पास एक सरकारी इको-टूरिज्म रिजॉर्ट को मैनेज कर रहे हैं।
निष्कर्ष:
मनीष की कहानी बताती है कि अगर उद्देश्य और लगाव सही हो, तो शहर की बड़ी नौकरी छोड़कर भी आप अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। उनके पिता की दी सीख और उनका प्रेम उन्हें हमेशा जंगल और प्रकृति के करीब बनाए रखता है।