
नागपुर।
महाराष्ट्र की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के करीबी माने जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं महाराष्ट्र विधान परिषद (एमएलसी) सदस्य संदीप जोशी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। निकाय चुनावों के नतीजों के तुरंत बाद उनके इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में चर्चाओं को तेज कर दिया है।
55 वर्षीय संदीप जोशी ने सोशल मीडिया के माध्यम से शुभचिंतकों के नाम एक भावुक पत्र साझा करते हुए कहा कि राजनीति उनके लिए कभी पद या प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह निस्वार्थ सेवा और समर्पण का मार्ग रही है। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि सत्ता के लिए हो रहा दलबदल, अवसरवाद और अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा न केवल आम मतदाताओं को बल्कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं को भी आहत कर रही है।
युवा पीढ़ी के लिए रास्ता खोलने का दावा
अपने निर्णय को स्पष्ट करते हुए जोशी ने कहा कि पार्टी और समाज में युवा प्रतिभाओं को आगे आने का अवसर मिलना चाहिए। गहन विचार-विमर्श के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक सफर को विराम देने का निर्णय लिया है। उन्होंने इस फैसले के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से क्षमा भी मांगी।
कार्यकाल पूरा करेंगे, आगे टिकट नहीं लेंगे
संदीप जोशी ने स्पष्ट किया कि विधान परिषद सदस्य के रूप में उनका कार्यकाल 13 मई 2026 को समाप्त हो रहा है और तब तक वे पार्टी द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाएंगे। इसके बाद वे न तो किसी पद के लिए टिकट मांगेंगे और न ही प्रस्ताव मिलने पर उसे स्वीकार करेंगे। उनका कहना है कि यह अवसर किसी आम कार्यकर्ता या पार्टी द्वारा चुने गए योग्य व्यक्ति को मिलना चाहिए।
आरएसएस और भाजपा के प्रति आभार
पूर्व नागपुर महापौर रह चुके जोशी ने अपने राजनीतिक जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका की सराहना की और कहा कि परिवार के बाद संघ ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने भाजपा द्वारा दिए गए अवसरों के लिए आभार जताते हुए कहा कि यदि वे राजनीति में बने रहते, तो आगे भी अवसर मिल सकते थे, लेकिन उनका विश्वास है कि उनकी उपस्थिति से किसी कार्यकर्ता के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।
संदीप जोशी का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल और अंदरूनी प्रतिस्पर्धा को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। उनके संन्यास को एक सिद्धांतवादी और आत्ममंथन से उपजा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे सकता है।