Sunday, February 1

बराबरी की भाषा: नए शब्द समाज ने चुने, थोपे नहीं गए

नई दिल्ली: हिंदी भाषा में महिलाओं के लिए ‘बराबरी की भाषा’ पर चर्चा ने एक बार फिर समाज और भाषा के बीच के गहरे संबंध को उजागर किया है। मार्च में इस पहल के आरंभ होने के बाद इसका स्वागत भी हुआ और आलोचना भी। आलोचक सीमित थे, लेकिन भाषा के जानकार होने के कारण उनकी बातों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।

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भाषाविदों ने तर्क दिया कि जैसे पुराने पेशों में महिलाएँ शामिल रहीं और उनके लिए हिंदी में स्त्रीलिंग शब्द बने – जैसे शिक्षिका, लेखिका, गायिका, अभिनेत्री, नायिका – वैसे ही अब नए पेशों में काम करने वाली

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