
बर्लिन/नई दिल्ली: भारत और जर्मनी के बीच रक्षा संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की दो दिवसीय भारत यात्रा के बाद जल्द ही भारत और जर्मनी के बीच 8 अरब डॉलर की AIP (एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन) से लैस सबमरीन डील हो सकती है।
यह डील भारत के समुद्री सामरिक बल को मजबूत करने के साथ-साथ नौसेना में लंबी अवधि तक पानी में रहने वाली उच्च तकनीक वाली पनडुब्बियों की क्षमताओं में वृद्धि करेगी। विश्लेषकों के अनुसार, इससे भारत हिंद महासागर में अपनी ताकत बढ़ा सकता है और रणनीतिक स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकता है।
भारत–जर्मनी रक्षा संबंधों का नया दौर
जर्मनी में सत्ता में आने के बाद यह मर्ज का पहला एशिया दौरा था। इस अवसर पर दोनों देशों ने सैन्य और औद्योगिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। अब भारत और जर्मनी मिलकर हथियार विकसित करेंगे, तकनीक का स्थानांतरण करेंगे और उनका संयुक्त उत्पादन करेंगे।
विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि एक समय जर्मनी की सरकार ने भारत को MP5 सबमशीनगन की आपूर्ति से रोक दिया था। तत्कालीन चांसलर एंजेला मर्केल के शासनकाल में यह प्रतिबंध लगाया गया था, उनका दावा था कि भारतीय पुलिस का मानवाधिकार रिकॉर्ड “खराब” है। लेकिन नई सरकार के आने के बाद यह प्रतिबंध हटा दिया गया है और अब भारत को एनएसजी समेत हथियारों की आपूर्ति की जा रही है।
सबमरीन डील का महत्व
भारत को मिलने वाली सबमरीन डील के तहत टाइप-214 एनजी सबमरीन भारत में ही बनाई जाएंगी। ये सबमरीन AIP तकनीक से लैस होंगी, जिससे वे लंबे समय तक पानी में रह सकती हैं और उच्च समुद्री रणनीति में सक्षम बनेंगी। भारत प्रोजेक्ट 75I के तहत इन सबमरीन में 6 नई पनडुब्बियों को शामिल करेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के बेड़े में भी AIP सबमरीन शामिल हो रही हैं। ऐसे में भारत के लिए यह डील रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, जर्मनी के साथ यह साझेदारी भारत को यूरोपीय अत्याधुनिक तकनीक के भरोसेमंद स्रोत तक पहुंच देती है।
आगे का रास्ता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चांसलर मर्ज के बीच जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि दोनों देश सैन्य अभ्यास, वरिष्ठ अधिकारियों का आदान-प्रदान और तकनीक में सहयोग को बढ़ावा देंगे। हेलीकॉप्टर सुरक्षा, ड्रोन तकनीक और नौसेना सहयोग को और मजबूत किया जाएगा।
विश्लेषकों के अनुसार, इस साझेदारी के साथ भारत अब रूस, इज़राइल और फ्रांस पर निर्भरता कम करके अपने रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक स्वतंत्रता सुनिश्चित कर रहा है।