
नई दिल्ली।
शादी के बाद जल्द बच्चा न होने पर महिलाओं को किस तरह मानसिक दबाव, तानों और डर के माहौल से गुजरना पड़ता है, इसकी एक मार्मिक मिसाल 30 वर्षीय श्रेया पांडेय की कहानी है। शादी के दो साल बीत जाने के बाद भी जब वह गर्भधारण नहीं कर सकीं, तो परिवार और रिश्तेदारों के लगातार सवालों और तानों ने उनकी जिंदगी को तनाव से भर दिया।
आज भी समाज में यह धारणा गहरी जमी हुई है कि शादी के एक-दो साल के भीतर बच्चा हो जाना चाहिए। अगर ऐसा न हो, तो सबसे पहले सवाल उठाने वाले अक्सर अपने ही करीबी होते हैं। श्रेया बताती हैं कि मायका हो या ससुराल—हर जगह बस एक ही सवाल गूंजता था, “गुड न्यूज कब दे रही हो?”
करियर की चाह पर भारी पड़ा पारिवारिक दबाव
श्रेया़ ने परिवार को समझाने की कोशिश की कि वह अभी 28 वर्ष की हैं और डॉक्टरों की सलाह के अनुसार उनके पास दो साल का समय है। वह चाहती थीं कि पहले नौकरी बदल लें, क्योंकि बच्चे के बाद जॉब चेंज करना और नई जिम्मेदारियां संभालना बेहद मुश्किल हो सकता है।
लेकिन उनकी बातों का परिवार पर कोई असर नहीं पड़ा। हर कुछ दिनों में वही चेतावनी दी जाती—“उम्र निकल जाएगी, बाद में इलाज कराना पड़ेगा।”
डर के माहौल में शुरू की प्रेग्नेंसी की कोशिश
लगातार मानसिक दबाव से थककर श्रेया ने करियर बदलने का सपना छोड़ दिया और गर्भधारण की कोशिश शुरू की। चार-पांच महीने तक प्रयास करने के बावजूद सफलता नहीं मिली। डर और चिंता के कारण उन्होंने खुद ही पति से डॉक्टर से सलाह लेने की जिद की।
AMH रिपोर्ट और IVF का डर
जांच में सामने आया कि श्रेया का AMH लेवल कम है। डॉक्टर ने कहा कि कुछ महीनों में गर्भ न ठहरने पर IVF कराना पड़ सकता है। यह सुनते ही श्रेया टूट गईं। उन्हें लगा कि शायद परिवार की बातें न मानकर उन्होंने गलती कर दी।
‘पहले ही कहा था, अब लाखों खर्च करो’
जब यह बात मां और सास को बताई गई, तो सहानुभूति की जगह ताने मिले—
“पहले ही कहा था समय पर कर लो। अब IVF में लाखों फूंको। भुगतो अपनी जिद।”
इन शब्दों ने श्रेया को अंदर तक तोड़ दिया। उन्हें लगा कि मुश्किल वक्त में मां भी उन्हें समझ नहीं पा रही हैं।
दूसरी राय ने बदली कहानी
इसी बीच पति ने हिम्मत दिखाई और दूसरे डॉक्टर से सलाह लेने का सुझाव दिया। नए डॉक्टर ने कहा कि तुरंत IVF की जरूरत नहीं है। कुछ दवाइयों, एक्सरसाइज और सही लाइफस्टाइल की सलाह दी गई।
श्रेया़ ने पूरी ईमानदारी से निर्देशों का पालन किया और दो महीने बाद वह गर्भवती हो गईं। प्रेग्नेंसी टेस्ट पर दिखीं दो गुलाबी लाइनें पूरे परिवार के लिए खुशी की खबर बन गईं।
अब भी मन में सवाल
हालांकि अंत अच्छा रहा, लेकिन श्रेया के मन में आज भी एक सवाल है—
“शादी के बाद परिवार इतना दबाव क्यों बनाता है? क्या वे नहीं समझते कि इस मानसिक तनाव से कपल्स को कितनी तकलीफ होती है?”
यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं की है जो मातृत्व को लेकर सामाजिक अपेक्षाओं और पारिवारिक दबाव के बीच पिस जाती हैं।