
संभल, शादाब रिजवी: संभल पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जामा मस्जिद सर्वे के दौरान पूरी तरह से थ्री-लेयर सुरक्षा व्यवस्था थी। धारा 163 लागू थी और आम लोगों की आवाजाही पूरी तरह बंद थी। बाजार भी बंद था। ऐसे में पुलिस का दावा है कि कोई भी व्यक्ति सामान से भरा ठेला लेकर हिंसा स्थल तक नहीं पहुंच सकता था।
पुलिस का कहना है कि हिंसा के दौरान एक युवक आलम को लगी गोली पुलिस द्वारा नहीं चलाई गई। संभल के एसपी कृष्ण कुमार के अनुसार, न्यायिक जांच में पुलिस की फायरिंग की कोई भूमिका नहीं पाई गई, बल्कि 29 पुलिसकर्मी खुद घायल हुए थे। एसपी ने बताया कि युवक के शरीर में लगी 7.65 एमएम की गोली पुलिस की ओर से इस्तेमाल नहीं की जाती। वहीं, पुलिस ने यह भी कहा कि उक्त गोली हिंसा के मास्टरमाइंड शारिक साटा गिरोह के तीन गुर्गों ने चलाई थी और गिरफ्तारियों के दौरान वह हथियार और गोली बरामद की जा चुकी है।
दरअसल, नखासा थाना क्षेत्र के मोहल्ला खग्गू सराय निवासी यामीन ने 6 फरवरी, 2025 को CJM कोर्ट में याचिका दायर की थी। यामीन ने बताया कि उनका बेटा आलम 24 नवंबर, 2024 को रस्क (टोस्ट) बेचने घर से निकला था और जामा मस्जिद क्षेत्र में पुलिस की गोली का शिकार हुआ। उन्होंने तत्कालीन सीओ संभल अनुज चौधरी और कोतवाली इंस्पेक्टर अनुज तोमर सहित अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सभी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था।
हिंसा कैसे भड़की:
संभल की जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष ने दावा किया था कि यह पहले हरिहर मंदिर था, जिसे 1529 में बाबर ने मस्जिद में बदलवा दिया। 19 नवंबर, 2024 को सिविल जज ने मस्जिद में सर्वे का आदेश दिया था। 24 नवंबर को सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और 29 पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस ने 12 FIR दर्ज कर 79 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया। इसमें सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क, सपा विधायक के बेटे सुहैल इकबाल सहित 40 लोगों को नामजद और 2750 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया था।
पुलिस प्रशासन ने साफ किया है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद फिलहाल ASP अनुज चौधरी सहित 15 से अधिक पुलिसकर्मियों पर FIR नहीं दर्ज की जाएगी। पुलिस इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगी।