Wednesday, January 14

माइनस 40 अंक पर भी मेडिकल पीजी? NEET-PG की नई कट-ऑफ ने खड़े किए योग्यता और मरीजों की सुरक्षा पर सवाल

नई दिल्ली।
देश में डॉक्टरों की गुणवत्ता और चिकित्सा शिक्षा के स्तर को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) द्वारा NEET-PG 2025 की न्यूनतम क्वालिफाइंग कट-ऑफ में भारी गिरावट किए जाने के बाद चिकित्सा जगत, छात्रों और आम जनता में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की मंजूरी के बाद NBEMS ने SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल को 40 से घटाकर शून्य कर दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि 800 अंकों की परीक्षा में माइनस 40 अंक पाने वाला उम्मीदवार भी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल काउंसलिंग के लिए पात्र माना जाएगा।

तीसरे राउंड की काउंसलिंग से लागू होगा फैसला

NBEMS के 13 जनवरी 2026 के नोटिस के अनुसार यह संशोधित कट-ऑफ 2025–26 सत्र के तीसरे राउंड की काउंसलिंग पर लागू होगी। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि केवल पात्रता मानदंड बदले गए हैं, रैंकिंग में कोई बदलाव नहीं किया गया है

अन्य श्रेणियों की कट-ऑफ भी गिरी

  • जनरल और EWS वर्ग:
    कट-ऑफ 50वें पर्सेंटाइल से घटकर 7वें पर्सेंटाइल पर
    अंक 276 से घटकर 103
  • जनरल PwD:
    कट-ऑफ 45वें से घटाकर 5वां पर्सेंटाइल
    अंक 255 से घटकर 90

डॉक्टरों की योग्यता पर सवाल

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त नाराज़गी देखी जा रही है। कई डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों का कहना है कि नेगेटिव स्कोर को क्वालिफाइंग मानना शैक्षणिक मानकों से समझौता है।

एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा,
“अगर कोई उम्मीदवार माइनस 40 अंक लाकर भी पीजी कर सकता है, तो क्या आप ऐसे डॉक्टर से अपने परिवार का इलाज कराएंगे?”

दूसरे यूजर ने इसे “एकेडमिक आपदा” करार देते हुए कहा कि यह नीति मेहनती छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय है।

कट-ऑफ घटाने की वजह क्या है?

NEET-PG 2025 का परिणाम 19 अगस्त 2025 को घोषित किया गया था। इसके बाद बड़ी संख्या में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें खाली रह गईं। इन्हें भरने के उद्देश्य से स्वास्थ्य मंत्रालय ने न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल में कटौती की अनुमति दी।

NBEMS ने अपने नोटिस में कहा है कि:

“यह पात्रता अस्थायी है और एडमिशन के समय उम्मीदवारों का MBBS/FMGE रिकॉर्ड, बायोमेट्रिक और फेस आईडी के माध्यम से सत्यापन किया जाएगा।”

नीति या समझौता?

जहां सरकार इसे सीटें भरने का प्रशासनिक कदम बता रही है, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

अब यह देखना होगा कि सरकार और मेडिकल काउंसिल इस बढ़ते असंतोष पर क्या रुख अपनाती है, क्योंकि मामला केवल प्रवेश का नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा है।

 

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