
पटना: बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की यात्राओं का विशेष स्थान रहा है। 2005 की ‘न्याय यात्रा’ से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी उनकी रणनीति का अहम हिस्सा है। इन यात्राओं के जरिए वे न केवल जनसमर्थन का सटीक आकलन करते हैं, बल्कि विरोध की लहर को भी समय रहते भांप लेते हैं।
2005 की ‘न्याय यात्रा’ बनी टर्निंग पॉइंट
नीतीश कुमार के यात्रा प्रेम की शुरुआत फरवरी 2005 में हुई। उस समय बिहार त्रिशंकु विधानसभा और राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था। राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद नीतीश ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया। जनता के बीच जाकर अपनी बात रखने के लिए उन्होंने ‘न्याय यात्रा’ निकाली। यह यात्रा जादुई असर दिखा गई और उसके बाद हुए चुनावों में नीतीश समर्थित एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला। इस ऐतिहासिक सफलता ने नीतीश के मन में यात्राओं के प्रति स्थायी विश्वास पैदा किया।
जनता के बीच जाकर समझते हैं राजनीति की नब्ज
नीतीश कुमार मानते हैं कि बंद कमरों में बैठकर राजनीति की नब्ज नहीं पहचानी जा सकती। यात्राओं का दूसरा बड़ा कारण यह है कि इसके जरिए उन्हें जमीन पर वास्तविक हालात का पता चलता है। जनता से सीधे मिलने से वे यह समझ पाते हैं कि सरकार के प्रति समर्थन कहाँ है और विरोध कहाँ। इसके आधार पर वे अपनी रणनीतियों में आवश्यक बदलाव कर लेते हैं।
यात्राएं = मास्टर स्ट्रोक की रणनीति
नीतीश की यात्राएं केवल प्रचार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि एक सशक्त फीडबैक औजार हैं। इन दौरों के जरिए वे प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय करते हैं और जनता की समस्याओं को करीब से देखते हैं। यही वजह है कि चुनावी साल हो या कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव, नीतीश की यात्राएं उनके लिए हमेशा एक सुरक्षा कवच और सफलता की गारंटी साबित हुई हैं।
इस बार 16 जनवरी से निकलने वाली ‘समृद्धि यात्रा’ भी इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वे सीधे जनता के बीच पहुंचकर जमीन का आकलन करेंगे और अपनी राजनीतिक चाल को और मजबूत बनाएंगे।