
गयाजी: ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की कहानी अटूट संकल्प और जिद का प्रतीक है। जब पहाड़ की वजह से समय पर इलाज न मिलने पर उनकी पत्नी फल्गुनी देवी का निधन हुआ, तो दशरथ ने अकेले ही पहाड़ का सीना चीरने का निर्णय लिया। 22 वर्षों की कठिन मेहनत से उन्होंने रास्ता बना कर साबित किया कि इंसान के हौसले के आगे कुदरत भी झुक जाती है।
पत्नी की मृत्यु और ठान लिया लक्ष्य
साल 1959 में गेहलौर की दुर्गम पहाड़ियों पर फल्गुनी देवी का पैर फिसल गया और अस्पताल तक पहुँचने में देरी के कारण उनका निधन हो गया। इस घटना ने दशरथ मांझी के जीवन का मार्ग बदल दिया। उन्होंने ठान लिया: “जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।”
22 साल की मेहनत और अविश्वसनीय उपलब्धि
दशरथ मांझी ने 1960 से 1982 तक अकेले ही 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता खोदा। कठोर क्वार्टजाइट की चट्टानों को साधारण हथौड़े और छेनी से तराशते हुए उन्होंने अत्री और वजीरगंज की दूरी 55 किलोमीटर से घटाकर मात्र 15 किलोमीटर कर दी।
समाज और सरकार पर प्रभाव
मुसहर समुदाय से आने वाले दशरथ मांझी के इस प्रयास ने पूरे इलाके की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बदल दी। बच्चों के लिए स्कूल और मरीजों के लिए अस्पताल अब आसानी से पहुँच योग्य हुए। हालांकि सरकार को इस मार्ग पर पक्की सड़क बनाने में दशकों का समय लगा, 2011 में इसे डामर सड़क में तब्दील किया गया।
सम्मान और फिल्मी दुनिया में पहचान
दशरथ मांझी को ‘बिहार रत्न’ से नवाजा गया और उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी हुआ। 2015 में निर्देशक केतन मेहता की फिल्म ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ के जरिए उनकी कहानी वैश्विक मंच तक पहुँची, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने उनके किरदार को जीवंत रूप में पेश किया। आज गेहलौर की घाटी उनके नाम पर तीर्थ स्थल जैसी बन चुकी है।