
पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई ‘समृद्धि यात्रा’ इस बार भी पश्चिम चंपारण से शुरू हो रही है। इसके पीछे सिर्फ राजनीतिक गणित ही नहीं, बल्कि इतिहास और श्रद्धा भी जुड़ी हुई है। नीतीश कुमार की महात्मा गांधी और बाबा भीम साहेब अंबेडकर में गहरी श्रद्धा रही है। इसलिए राज्य के विकास और जनता के हित के लिए आयोजित समृद्धि यात्रा की शुरुआत हमेशा चंपारण से ही होती है।
राजनीतिक तंत्र और नीतीश का निशाना
नीतीश कुमार जानते हैं कि पश्चिम चंपारण में भाजपा और जदयू की संयुक्त ताकत महागठबंधन को हराने में निर्णायक भूमिका निभाती है। 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को 16 सीटें मिली थीं, जबकि 2025 में यह घटकर 11 रह गईं। यहां जातीय आधार पर बीजेपी के मतदाता ज्यादा हैं और जदयू के कम, इस कारण राजनीतिक रणनीति गठबंधन पर आधारित होती है।
महात्मा गांधी का ऐतिहासिक कनेक्शन
पश्चिम चंपारण के भितिहरवा से महात्मा गांधी का गहरा संबंध रहा है। अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन की शुरुआत यहीं से हुई थी। नीतीश कुमार के लिए यह क्षेत्र न केवल राजनीतिक महत्व का है, बल्कि इतिहास और श्रद्धा का प्रतीक भी है।
पश्चिम चंपारण की राजनीति
पश्चिम चंपारण में कुल 9 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से जदयू के पास दो हैं—वाल्मीकिनगर (रिंकू सिंह) और सिकटा (समृद्ध वर्मा)। बाकी सीटें भाजपा के पास हैं। यह क्षेत्र विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और जदयू की पकड़ दिखाने का अहम आधार है।
पूर्वी चंपारण की राजनीति
पूर्वी चंपारण में कुल 12 विधानसभा सीटें हैं। 2025 के चुनाव में भाजपा ने 7 और जदयू ने 2 सीटें जीतीं, जबकि लोजपा को 2 सीटें और राजद को केवल ढाका विधानसभा सीट पर जीत मिली। यह क्षेत्र भी एनडीए गठबंधन पर निर्भर करता है।
यात्रा की शुरुआत क्यों पश्चिम चंपारण से?
बिहार की 243 विधानसभा सीटों की गणना पश्चिम चंपारण के वाल्मीकिनगर से शुरू होती है। यहां से सीमांचल होते हुए राज्य की राजनीतिक यात्रा आगे बढ़ती है। नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा की शुरुआत इसी ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व वाले क्षेत्र से करना रणनीति और श्रद्धा का दोहरा प्रभाव दर्शाता है।