Wednesday, January 14

महंगे निजी स्कूलों में गरीब बच्चों की मुफ्त पढ़ाई अनिवार्य, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून को मजबूती देते हुए एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे निजी, गैर-सहायता प्राप्त और गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें अनिवार्य रूप से आरक्षित करने के लिए स्पष्ट नियम और प्रक्रिया तय करें।

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अदालत ने दो टूक कहा कि गरीब और वंचित बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक ‘राष्ट्रीय मिशन’ होना चाहिए, जिससे संविधान में निहित भाईचारे (Fraternity) का लक्ष्य साकार हो सके।

रिक्शा चालक और करोड़पति का बच्चा एक ही कक्षा में पढ़े

मंगलवार को दिए गए फैसले में जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने बेहद सशक्त टिप्पणी करते हुए कहा,
“संविधान में भाईचारे का सपना तभी पूरा होगा, जब एक रिक्शा चालक का बच्चा, एक करोड़पति या सुप्रीम कोर्ट के जज के बच्चे के साथ एक ही स्कूल और एक ही कक्षा में पढ़े।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरटीई कानून का उद्देश्य केवल दाखिला दिलाना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के बच्चों को समान शैक्षणिक माहौल उपलब्ध कराना है।

RTE कानून की धारा 12 को बताया संवैधानिक मूल्यों की रीढ़

अदालत ने कहा कि RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) सिर्फ एक कल्याणकारी प्रावधान नहीं है, बल्कि यह अनुच्छेद 21A (शिक्षा का मौलिक अधिकार) और अनुच्छेद 39(f) के तहत बच्चे के सर्वांगीण विकास के संवैधानिक लक्ष्य को पूरा करने का माध्यम है।
पीठ ने कोठारी आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए ‘कॉमन स्कूल सिस्टम’ की अवधारणा को दोहराया, जिसमें समाज के हर वर्ग के बच्चों को बिना भेदभाव समान शिक्षा देने की बात कही गई थी।

तालमेल नहीं बिठा पाएंगे’ वाली दलील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने उस आशंका को भी सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा जाता है कि गरीब बच्चे अमीर बच्चों के साथ पढ़कर तालमेल नहीं बिठा पाएंगे।
अदालत ने कहा कि यह जिम्मेदारी शिक्षकों और स्कूल व्यवस्था की है कि वे इन बच्चों को बोझ नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुभव के स्रोत के रूप में देखें, ताकि उनका आत्म-सम्मान बढ़े और वे खुद को बराबरी का महसूस कर सकें।

सरकारों को नियम बनाने का निर्देश

कोर्ट ने RTE कानून की धारा 38 के तहत केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया कि वे स्पष्ट नियम बनाएं, जिनमें यह तय हो कि—

  • कमजोर और वंचित तबके के बच्चों की पहचान कैसे होगी
  • उन्हें पड़ोस के निजी स्कूलों में किस प्रक्रिया से दाखिला मिलेगा

इसके लिए अदालत ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों और राष्ट्रीय व राज्य सलाहकार परिषदों से परामर्श लेने को कहा है।

31 मार्च तक रिपोर्ट, 6 अप्रैल को अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR को निर्देश दिया है कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह जानकारी एकत्र करे कि RTE की धारा 12(1)(c) को लागू करने के लिए क्या नियम बनाए गए हैं। आयोग को 31 मार्च तक हलफनामा दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।

क्या है पूरा मामला

यह मामला उन व्यावहारिक दिक्कतों से जुड़ा है, जिनका सामना EWS श्रेणी के बच्चों को निजी स्कूलों में RTE के तहत दाखिला लेते समय करना पड़ता है। याचिका एक ऐसे अभिभावक ने दायर की थी, जिनके बच्चों को 2016 में सीटें उपलब्ध होने के बावजूद पड़ोस के स्कूल में मुफ्त प्रवेश नहीं मिला था।

निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ शिक्षा नीति नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और संवैधानिक भाईचारे की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। अब महंगे निजी स्कूलों के दरवाजे गरीब बच्चों के लिए भी खुलेंगे—वो भी बिना फीस—और यही नए भारत की शिक्षा की असली तस्वीर होगी।

 

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