
मुंबई। बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर भाषा और अस्मिता के मुद्दे पर गरमा गई है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) प्रमुख राज ठाकरे ने मुंबई में आयोजित संयुक्त रैली के दौरान हिंदी और हिंदी भाषी उत्तर भारतीयों को लेकर विवादित बयान दिया। शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ मंच साझा करते हुए राज ठाकरे ने कहा कि यदि हिंदी महाराष्ट्र पर थोपी गई, तो वे इसका कड़ा विरोध करेंगे।
राज ठाकरे ने अपने भाषण में कहा, “मुझे किसी भाषा से नफरत नहीं है, लेकिन उसे जबरन थोपने का मैं विरोध करता हूं। यूपी और बिहार के लोगों को यह समझना चाहिए कि हिंदी आपकी भाषा हो सकती है, लेकिन महाराष्ट्र की पहचान मराठी है। अगर कोई यहां भाषा थोपने की कोशिश करेगा, तो हम चुप नहीं बैठेंगे।” उनके इस बयान पर सभा में मौजूद समर्थकों ने तालियां बजाईं।
मराठी अस्मिता को बनाया चुनावी मुद्दा
15 जनवरी को होने वाले बीएमसी चुनाव से पहले ठाकरे बंधुओं ने मराठी अस्मिता को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति तेज कर दी है। राज ठाकरे ने चुनाव को मराठियों के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि अगर आज मराठी समाज एकजुट नहीं हुआ, तो जमीन और भाषा दोनों हाथ से निकल जाएंगी। उन्होंने दावा किया कि यह चुनाव मराठियों के लिए निर्णायक है और इसे गंवाने का मतलब अपने अस्तित्व को खतरे में डालना होगा।
बीजेपी पर लगाए आरोप
राज ठाकरे ने त्रिभाषा फॉर्मूला और कक्षा 1 से 5 तक हिंदी को अनिवार्य करने के प्रस्ताव को “साजिश” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी मुंबई को लूटने और उसे गुजरात के आर्थिक दायरे में ले जाने की कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि यदि बीएमसी पर स्थानीय दलों का नियंत्रण रहा, तो शहर की जमीन किसी बड़े उद्योगपति को नहीं बेची जा सकेगी।
उद्धव ठाकरे का हमला
रैली को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि उन्होंने मराठी मानूस, हिंदुत्व और महाराष्ट्र के हित में पुराने मतभेद भुला दिए हैं। उन्होंने बीजेपी पर नकली हिंदुत्व और विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगाया। साथ ही तमिलनाडु बीजेपी नेता के. अन्नामलाई के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने मुंबई को महाराष्ट्र का शहर न बताकर अंतरराष्ट्रीय शहर कहा था। उद्धव ठाकरे ने सवाल उठाया कि क्या बीजेपी मुंबई का नाम फिर से ‘बॉम्बे’ करना चाहती है।
उद्धव ठाकरे ने देवेंद्र फडणवीस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए और दावा किया कि पिछली शिवसेना-बीजेपी सरकार के दौरान बीएमसी में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुईं।
बीएमसी चुनाव से पहले इस तरह के बयानों ने राजनीतिक माहौल को और तीखा बना दिया है, वहीं भाषा और अस्मिता का मुद्दा एक बार फिर मुंबई की राजनीति के केंद्र में आ गया है।