Monday, January 12

तेजस्वी के स्वागत में विधायकों की गैरहाजिरी पर सवाल, शिवानंद तिवारी ने बताया ‘अशुभ लक्षण’

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीतर मंथन तेज होता नजर आ रहा है। पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के करीबी और वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर तीखे सवाल खड़े किए हैं। तेजस्वी यादव के छुट्टियां मनाकर पटना लौटने पर उनके स्वागत में विधायकों की अनुपस्थिति को शिवानंद तिवारी ने पार्टी के लिए “अशुभ लक्षण” करार दिया है।

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शिवानंद तिवारी का कहना है कि चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व को और अधिक सक्रिय होकर जमीन पर उतरना चाहिए था, लेकिन हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने इशारों-इशारों में यह भी कहा कि मौजूदा घटनाक्रम राजद के भविष्य और नेतृत्व की दिशा को लेकर गंभीर संकेत दे रहा है।

स्वागत में नेता नहीं, कैमरों की भीड़
तेजस्वी यादव के पटना एयरपोर्ट पर स्वागत को लेकर शिवानंद तिवारी ने तंज कसते हुए कहा कि वहां पार्टी का कोई भी विधायक नजर नहीं आया। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं से ज्यादा मीडिया के कैमरे मौजूद थे। शिवानंद तिवारी ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि तेजस्वी एयरपोर्ट से सीधे अपने आवास चले गए और पार्टी कार्यालय जाना जरूरी नहीं समझा। उनके अनुसार, यह व्यवहार पार्टी कार्यकर्ताओं और संगठन के लिए उत्साहवर्धक नहीं है।

तेजस्वी का सरकार को 100 दिन का समय
पटना पहुंचने पर तेजस्वी यादव ने कहा कि वे नई एनडीए सरकार को काम करने के लिए 100 दिनों का समय देंगे, जिसके बाद सरकार की समीक्षा की जाएगी। उन्होंने ‘डबल इंजन’ सरकार पर निशाना साधते हुए भ्रष्टाचार, पलायन और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे मुद्दों को उठाया। साथ ही उन्होंने महिलाओं को दो-दो लाख रुपये देने जैसे चुनावी वादों की याद भी दिलाई।

नेतृत्व क्षमता पर फिर बहस
शिवानंद तिवारी पहले भी तेजस्वी यादव के विदेश दौरों और राजनीतिक सक्रियता को लेकर सवाल उठा चुके हैं। इस बार उन्होंने साफ कहा कि तेजस्वी में अगले पांच वर्षों तक प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाने की क्षमता नजर नहीं आती। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से सलाह दी कि तेजस्वी को ‘नेता’ के बजाय ‘कार्यकर्ता’ की भूमिका में उतरकर जनता के बीच जाना चाहिए और हार को सहजता से स्वीकार कर संगठन को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।

राजद के भीतर उठ रही यह आवाजें साफ संकेत दे रही हैं कि चुनावी हार के बाद पार्टी में आत्ममंथन और नेतृत्व को लेकर बहस और तेज हो सकती है।

 

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