Wednesday, January 7

उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज, पिता का संक्षिप्त बयान—“फैसला आपके सामने है”

 

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दिल्ली दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद उमर खालिद के पिता का पहला रिएक्शन सामने आया है। मीडिया से बातचीत में खालिद के पिता एस.क्यू.आर. इलियास ने बेहद संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मुझे कुछ नहीं कहना है। फैसला आपके सामने है।”

 

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इस आधार पर अदालत ने दोनों को जमानत देने से इनकार कर दिया।

 

यह फैसला न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि मौजूदा चरण में आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा। हालांकि, इसी मामले में अन्य पांच आरोपियों—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को जमानत दे दी गई है।

 

“मुकदमे में देरी जमानत का आधार नहीं”

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमे में देरी अपने आप में जमानत का आधार नहीं बन सकती। पीठ ने कहा कि देरी को “तुरुप का इक्का” मानकर वैधानिक सुरक्षा प्रावधानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं है और प्रत्येक याचिका का मूल्यांकन अलग-अलग तथ्यों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

 

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री से यह संतोषजनक रूप से सामने आता है कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध होते हैं। इसलिए कार्यवाही के इस चरण में उन्हें जमानत देना उचित नहीं है।

 

क्या है पूरा मामला

 

उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों का “मुख्य साजिशकर्ता” होने का आरोप है। दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ यूएपीए और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

 

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह हिंसा नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी।

 

शीर्ष अदालत ने 10 दिसंबर को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था, जिसे अब सुनाया गया है।

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