
जयपुर: राजस्थान की राजनीति में योग्यता और अनुभव के साथ-साथ भाग्य की भूमिका भी निर्णायक रही है। कई बार यह देखा गया है कि वर्षों का संघर्ष, संगठनात्मक क्षमता और जनता का भरोसा होने के बावजूद कुछ नेता अपेक्षित मुकाम तक नहीं पहुँच पाते, जबकि कुछ को कम समय में सत्ता का शिखर मिल जाता है।
राजस्थान की राजनीति इसका स्पष्ट उदाहरण पेश करती है। यहाँ घनश्याम तिवाड़ी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की राजनीतिक यात्रा दो बिल्कुल अलग कहानियां बयां करती हैं।
ब्राह्मण नेतृत्व का बदलता परिदृश्य
एक दौर ऐसा भी था जब राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा, दोनों दलों में प्रभावशाली ब्राह्मण नेता सक्रिय भूमिका में थे। उनके पास न केवल अपनी पार्टी में वर्चस्व था, बल्कि प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने की शक्ति भी। आज इस स्तर के नेतृत्व का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। मुख्यमंत्री पद मिलने के बावजूद ब्राह्मण समाज का औपचारिक संतोष तो मिला, लेकिन हरिदेव जोशी जैसे प्रभावशाली नेताओं का दौर अब इतिहास बन चुका है।
तिवाड़ी: संघर्ष और असमर्थ किस्मत
सीकर से राजनीति की शुरुआत करने वाले घनश्याम तिवाड़ी संगठन खड़ा करने में माहिर रहे, लेकिन उनके सामने हर मोड़ पर नई चुनौतियां आती रहीं। तीसरे विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें अपना गृह क्षेत्र छोड़ना पड़ा और अन्य क्षेत्रों में सफलता नहीं मिली। दीनदयाल वाहिनी के माध्यम से नई राजनीतिक उड़ान भरने की कोशिशें सफल न हो सकीं, और कांग्रेस में शामिल होना उनकी सबसे बड़ी भूल मानी गई। हालांकि अब वे भाजपा में उच्च सदन के सदस्य हैं, लेकिन यह उनके संघर्ष की पूर्ण उपलब्धि नहीं मानी जा सकती।
भजनलाल शर्मा: किस्मत का साथ
दूसरी ओर, भजनलाल शर्मा को राजनीति में किस्मत का पूरा साथ मिला। पहले ही विधानसभा चुनाव में जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद तक पहुँचने का अवसर मिला। सामाजिक न्याय मंच से शुरुआत करने के बावजूद सत्ता के शिखर तक उनका रास्ता अपेक्षाकृत सहज रहा।
निष्कर्ष: संघर्ष बनाम किस्मत
इन दोनों नेताओं की यात्रा यह स्पष्ट करती है कि राजस्थान की राजनीति में योग्यता और संघर्ष से अधिक निर्णायक भूमिका अक्सर भाग्य की रही है। तिवाड़ी और भजनलाल की कहानियाँ इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि राजनीति में सफलता केवल मेहनत और संगठन से नहीं, बल्कि सही समय और अवसर की समझ से भी तय होती है।