
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो आंकड़ों से ज्यादा अपने अंदाज़, जज़्बे और किस्मत की विडंबनाओं के लिए याद किए जाते हैं। रमन लांबा उन्हीं नामों में से एक हैं। अपने दौर के सबसे स्टायलिश और आक्रामक बल्लेबाज, जिनका करियर जितना चमकदार था, अंत उतना ही दर्दनाक। आज 2 जनवरी को रमन लांबा की जयंती है—एक ऐसा दिन, जो क्रिकेट प्रेमियों को प्रतिभा, विवाद और त्रासदी से भरी उनकी कहानी याद दिलाता है।
मेरठ से रणजी तक, स्टाइल का दूसरा नाम
2 जनवरी 1960 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे रमन लांबा को घरेलू क्रिकेट का सुपरस्टार माना जाता था। दिल्ली के लिए 1980-81 में रणजी ट्रॉफी से करियर की शुरुआत करने वाले लांबा चार दिवसीय क्रिकेट में भी टी20 जैसी आक्रामक बल्लेबाजी करते थे। उनके शॉट्स देखने के लिए दर्शक खास तौर पर मैदान पहुंचते थे।
1994-95 का रणजी सीजन उनके करियर का स्वर्णिम अध्याय रहा। इस सीजन में उन्होंने 1034 रन, 3 शतक और 4 अर्धशतक लगाए। इसी दौरान फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनका सर्वोच्च स्कोर 312 रन रहा, जो लंबे समय तक दिल्ली का रिकॉर्ड बना रहा।
कुल मिलाकर लांबा ने 121 फर्स्ट क्लास मैचों में 8776 रन, 53.84 की औसत से बनाए, जिसमें 31 शतक और 27 अर्धशतक शामिल हैं—जो उनकी निरंतर आक्रामकता का प्रमाण है।
टेस्ट में नाकामी, वनडे में धमाल
रमन लांबा का अंतरराष्ट्रीय करियर उनकी प्रतिभा के अनुरूप नहीं रहा। 1986 में श्रीलंका के खिलाफ कानपुर टेस्ट से पदार्पण करने वाले लांबा केवल 4 टेस्ट मैच ही खेल सके। उंगली में चोट और चयन की अनिश्चितता ने उनका टेस्ट करियर लगभग खत्म कर दिया।
हालांकि वनडे क्रिकेट उनके स्वभाव के ज्यादा अनुकूल था। कृष्णमाचारी श्रीकांत के साथ उनकी ओपनिंग जोड़ी अपने समय से आगे की सोच का उदाहरण थी। यह वही आक्रामक शैली थी, जिसने बाद में 1990 के दशक में क्रिकेट की दिशा बदली और सचिन तेंदुलकर जैसे बल्लेबाजों को ओपनर बनने की प्रेरणा दी।
लांबा ने 32 वनडे मैचों में 783 रन, 1 शतक और 6 अर्धशतक लगाए।
मैदान पर विवाद और 10 महीने का बैन
1990 के रणजी सीजन में मुंबई के गेंदबाज राशिद पटेल के साथ मैदान पर हुई मारपीट ने लांबा के करियर को बड़ा झटका दिया। बहस इतनी बढ़ी कि लांबा स्टंप्स उखाड़कर पटेल के पीछे दौड़ पड़े। नतीजा—लांबा पर 10 महीने और पटेल पर 14 महीने का बैन। इसी दौरान लांबा आयरलैंड चले गए, जहां उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
विदेशी धरती पर प्यार और नई पहचान
आयरलैंड में क्लब क्रिकेट खेलते समय रमन लांबा की मुलाकात किम मिशेल क्रॉथर से हुई। पहली नजर का प्यार जल्द ही शादी में बदल गया। सितंबर 1990 में दोनों ने लव मैरिज की। इस रिश्ते के बाद लांबा ने आयरलैंड की ओर से खेलने की कोशिश भी की और वहां के क्लब क्रिकेट में अहम भूमिका निभाई।
तीन गेंद और एक जानलेवा फैसला
20 फरवरी 1998—क्रिकेट इतिहास का सबसे दर्दनाक दिन। ढाका प्रीमियर लीग में अबहानी क्लब की ओर से खेलते हुए लांबा ने आखिरी तीन गेंदों में शॉर्ट लेग पर फील्डिंग करने का फैसला किया। कप्तान ने मना किया, लेकिन वे नहीं माने। हेलमेट भी नहीं पहना।
अगली ही गेंद पर बल्लेबाज मेहराब हुसैन का पुल शॉट सीधे लांबा के माथे पर लगा। “मैं तो मर गया…” कहते हुए वे गिर पड़े। अस्पताल में ब्रेन हेमरेज के कारण वे कोमा में चले गए और 23 फरवरी 1998 को उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र महज 38 साल थी।
अधूरी विरासत
रमन लांबा की मौत ने क्रिकेट जगत को झकझोर दिया। जिस खिलाड़ी ने आक्रामक बल्लेबाजी की नींव रखी, वही सुरक्षा के अभाव में मैदान पर जान गंवा बैठा। उनकी कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि प्रतिभा के साथ अनुशासन और सुरक्षा कितनी जरूरी है।
रमन लांबा—एक ऐसा सितारा, जो बहुत तेज चमका, लेकिन बहुत जल्दी बुझ गया।