Monday, June 15

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तारिक रहमान की 17 साल बाद वतन वापसी: बांग्लादेश की सत्ता-समीकरण में बड़ा मोड़, भारत के लिए राहत या नई चुनौती?

 

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ढाका।

बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान की लगभग 17 वर्षों बाद स्वदेश वापसी देश की सत्ता की लड़ाई को नया आयाम दे रही है। उनकी वापसी ऐसे समय हो रही है जब बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक आंदोलनों और कट्टरपंथी ताकतों के उभार से जूझ रहा है, वहीं फरवरी 2026 में आम चुनाव प्रस्तावित हैं।

 

राजनीतिक शून्य में तारिक की एंट्री

 

शेख हसीना की अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किए जाने के बाद देश में जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ, उसे भरने की कोशिश कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी कर रहा है। ऐसे में तारिक रहमान की वापसी को लोकतांत्रिक राजनीति की संभावित वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। ढाका में उनके स्वागत के लिए उमड़ी भारी भीड़ इस बात का संकेत है कि बीएनपी समर्थकों में उन्हें लेकर जबरदस्त उत्साह है।

 

भारत की नजरें क्यों टिकी हैं तारिक रहमान पर

 

भारत के लिए यह घटनाक्रम खास मायने रखता है। अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास आई है। यूनुस के भारत-विरोधी बयानों और जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती सक्रियता ने नई दिल्ली की चिंता बढ़ाई है। ऐसे में तारिक रहमान को एक राजनीतिक, गैर-कट्टरपंथी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

 

भारत का रुख साफ है—वह उसी सरकार को मान्यता देगा, जिसे बांग्लादेश की जनता लोकतांत्रिक तरीके से चुनेगी। इस संदर्भ में तारिक रहमान भारत के लिए एक संभावित संतुलनकारी शक्ति बन सकते हैं।

 

‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नीति और दिल्ली-पिंडी से दूरी

 

तारिक रहमान खुद को लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का समर्थक बताते हैं। हाल ही में उन्होंने ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नाम से अपनी विदेश नीति की रूपरेखा पेश की, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी प्राथमिकता न तो दिल्ली होगी और न ही पिंडी (रावलपिंडी)।

इस बयान को भारत और पाकिस्तान दोनों से संतुलित दूरी बनाने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जो कूटनीतिक तौर पर नई जटिलताएं भी पैदा कर सकता है।

 

जमात-ए-इस्लामी से ‘लाल रेखा’

 

तारिक रहमान ने जमात-ए-इस्लामी से किसी भी तरह के गठबंधन से साफ इनकार किया है। लंदन से अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि जमात ने बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का साथ दिया और लाखों बंगालियों की हत्या में भूमिका निभाई।

इस बयान के बाद साफ हो गया है कि बीएनपी और जमात के बीच एक वैचारिक दीवार खड़ी हो चुकी है।

 

कट्टरपंथी खेमे में खलबली

 

बांग्लादेश से आ रही रिपोर्ट्स के मुताबिक तारिक रहमान की वापसी से जमात और अन्य कट्टरपंथी दल असहज हैं। उन्हें डर है कि शेख हसीना के बाद जो राजनीतिक स्पेस उन्हें मिलता दिख रहा था, वह तारिक की वापसी से छिन सकता है। ऐसे में बीएनपी और जमात समर्थकों के बीच टकराव की आशंका भी जताई जा रही है, जिससे चुनावी माहौल और अशांत हो सकता है।

 

तारिक रहमान के सामने बड़ी परीक्षा

 

तारिक रहमान के सामने सिर्फ सत्ता हासिल करने की चुनौती नहीं है, बल्कि

 

देश को राजनीतिक अस्थिरता से बाहर निकालना

हिंसा पर लगाम लगाना

युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरना

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना

और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना

 

जैसी बड़ी जिम्मेदारियां भी हैं।

 

निष्कर्ष

 

तारिक रहमान की वापसी बांग्लादेश के लिए अवसर भी है और जोखिम भी। यदि वे लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ देश को स्थिरता की ओर ले जाते हैं, तो न सिर्फ बांग्लादेश बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में संतुलन और शांति का रास्ता खुल सकता है। लेकिन अगर राजनीतिक संघर्ष और कट्टरपंथ हावी रहा, तो देश एक बार फिर अंधेरे दौर में फंस सकता है।

भारत समेत पूरी दुनिया की नजरें अब तारिक रहमान की अगली चाल पर टिकी हैं।

 

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