Bhojpuri: चाह पिआईं अउर चाह बढ़ाईं, पढ़ीं चाय के गुणगान


चाय के भोजपुरी में चाह कहल जाला. चाह माने इच्छा, कामना, ख्वाहिश, तमन्ना. कहे के मतलब ई कि चाह पिअला से चाह लागेला,मन-मिज़ाज तरोताजा रहेला, थकइनी खतम होला आ किछु बेहतर करेके चाह जागेला. कतहीं मन के बात चाह का संगें कहल-सुनल जाला, त कतहीं चाह पर चरचा देखि-सुनिके किसिम-किसिम के विचार आंतर में हुलास-उछाह आउर उदबेग जगावेला. का चाह पिअला से तिसरकी आंखि खुलि जाले? डुमरांव (बिहार) के हिन्दी-भोजपुरी के हास-व्यंग के नामी कवि दावा के साथ कहत रहलन कि चाह पिअला से आंखि के रोशनी बढ़ि जाला. फेरु त मुगलेसराय से डुमरांव लउके लागेला. उन्हुकर साफ कहनाम रहे-

पीने से चाय आंख की

बढ़ती है रोशनी,

डुमरांव नज़र आता हैमुगलसराय से!

कोरोलकाल के हाल ई बा कि गरम पेय के डंका बाजत बा आ ठंढा पेय चोर नियर मुंह लुकववले फिरत बा. सभ केहू काढ़ा पी रहल बा, गरमागरम बाफ ले रहल बा आ चाह पी-पी के भीतर-बहरी से गरमी हासिल करत बा. चाह आजुकाल्ह जिनिगी खातिर संजीवनी हो गइल बा. केहू दूध के चाह पिअत बा,त केहू बिना दूध के. नींबू के चाह के बाजार गरम बा. अदरख के कड़कदार चाह के त का कहे के! ई सउंसे कोरोनाकाल चाहमय हो गइल बा.

पहिले लरिकन के चाह पिए से दूर राखल जात रहे. ओह घरी दूध सभसे सेसर एक नंबर के पेय रहे. बाकिर अब त लरिकन के कतनो चॉकलेट-बिस्कुट-दूध देके पोल्हावल चाहीं, बाकिर ऊ उछड़ि-उछड़ि के तब ले छरनात रही, जब ले चाह के कप ओकनी के ना थम्हावल जाई. एह निसा का सोझा मए निसा फेल बाड़न स. एह दिसाईं पुन्नश्लोक जगन्नाथ जी के एगो शे’र तनी-मनी फेर-बदल करत उहां से माफी मांगत उद्धृत कइल चाहबि-

चाह पिए के जनमे से लागल लकम,

अब का छूटी,निसा ई पुराना भइल.

पहिले भोजपुरिया इलाका के मशहूर पेय रहे शरबत. ओकरा के रस कहल जात रहे. हरेक पर-परोजन में खातिरदारी खातिर शरबत अहम भूमिका निबाहत रहे. बाल्टी के पानी में गूर आउर दही घोरीं. फेरु त मीठरस शरबत तय्यार! चाहे अंगना में माड़ो गड़ात होखे, दुआर प बरिअतिहन के पानी पिआवल जात होखे, तिलक का दिने तिलकहरुन के आवभगत होत होखे भा दोसरा कवनो मोका प मेहमानन के स्वागत-सत्कार होत होखे-शरबत के मिठास नेह-नाता के रसमाधुरी में चार चान लगावत रहे.

बाकिर जब से चाह पिए-पिआवे के चलन शुरू भइल, एकरा आगा शरबती मिठास फीका परत गइल. फेरु त ई स्थिति आ गइल कि भलहीं लाख मिठाई-फल-नमकीन से अतिथि के सत्कार करीं, बाकिर अगर आखिर में चाह ना पिअवनीं,त सभ कइल-धइल माटी में मिलि जाई आ पिछड़ल के उपाधि से नवाजल जाई. एह से देश के कवनो कोना-अंतरा में चलि जाईं, चाह के दोकान खातिरदारी में हाजिर रही. भरुकावाली कुल्हड़ के चाह के त कहहीं के का! माटी के सोन्ह गमक का संगें चाह के चुस्की लेबे के मजे किछु अउर होला, जवना के सवाद के बखान गूंग के गूर-अस ना कइल जा सके. बंगाल में बेगर दूध के चाह मने भावेला, त पंजाब में दूधवाली भरल गिलास के चाह. पसन आपन-आपन, खयाल आपन-आपन! ‘जिधर देखता हूं, उधर तू ही तू है, न तेरी-सी रंगत, न तेरी-सी बू है!’

आजुकाल्ह भितरिया ताकत खातिर ‘ग्रीन टी’ के चलन खूब बढ़ल बा. सभसे पहिले चीन के लोग ओह ग्रीन टी के महातम बतावल. अमेरिका सहित पच्छिमी देश ब्लैक टी के उम्दा चाह मानेला. तकरीबन चार हजार साल पहिले चीन में चाह के खोज अचानके भइल रहे. दरअसल भइल ई कि चीन के राजा शिन नोंग थाकल-हारल जंगल में सुस्तात रहलन. बगल में पानी खउलत रहे. तलहीं जंगल के किछु पतई ओह खउलत पानी में गिरल आ पानी के रंग लाल होखे लागल. राजा जब ऊ पानी पिअलन,त ओकर सवाद बहुत बढ़िया लागल आ देखते-देखत उन्हुकर थकइनी दूर हो गइल. शिन नोंग पतई तूरिके महल में ले अइलन आ एह तरी चार हजार साल पहिले ओह जादुई पतई चाह के खोज भइल.

बाकिर अपना देश में एकर पइसार सन् 1823 में भइल, जवना घरी आपन मुलुक अंगरेजन के गुलाम रहे आ अंगरेजे गांवागाईं आके मुफुते में चाह पिआवत आ एकर पतई बांटत लत लगवलन स. ऊ एकरा के राष्ट्रीय पेय घोषित कइलन स.

चाह के पहिला पउधा आसाम में मणिराम दीवान लगवले रहलन,जे देश के आजादी के सेनानी रहलन आ 1857के संग्राम में उन्हुका के फांसी प चढ़ा दिहल गइल रहे. ओइसे त आसाम आ दार्जिलिंग के चाह सउंसे दुनिया में मशहूर बा,बाकिर सभसे महंग आ दुनिया में सर्वश्रेष्ठ उत्तराखंड के आर्थोडाक चाह के मानल जाला. ऊ चाह एगो सैलानी बिशप हेलर 1824में जब कुमाऊं में गइलन, त उहां के जंगल में खरपताई नियर पसरल देखलन. उहां के जलवायु चाह के खेती खातिर उपयुक्त लागल रहे. वनस्पति विज्ञानी डॉ रायले के सुझाव पर गवर्नर जनरल लाॅर्ड विलियम बैटिंग पहाड़ी क्षेत्र में चाह के उद्योग शुरू करेके निरनय लेले रहलन.सन्1835में कोलकात्ता से चाह के दू हजार पउधा मंगावल गइल आ कुमाऊं आउर गढ़वाल के एगारह हजार एकड़ में तिरिसठ बगानन में चाह के उन्नत खेती होखे लागल रहे. उहां के सर्वोत्तम आर्थोडाक चाह के अतना प्रसिद्धि मिलल कि अमेरिका, नीदरलैंड, कोरिया वगैरह देशन में दस हजार रोपया किलो के हिसाब से डेढ़ लाख किलो चाह के निर्यात होखे लागल. आर्थोडाक चाह के खूबी ओकर अनूठा सवाद त बड़ले बा, ई धूम्रपान के निसा से निजात दिअवा देले आ एही से एकर खेती रानीखेत,भीमताल,दूनागिरी,बेरीनाग, भवाली में होला.

खाली दार्जिलिंग आ आसामे में ना,हिमाचल, बिहार, सिक्किम, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मेघालयो में चाह के खेती औद्योगिक पैमाना प हो रहल बा.

चाह के सउंसे संसार में शोहरत अकारन नइखे भइल. एकरा में कई गो गुन समाहित बा. कोरोना के दुनियावी महामारिए में ना,ई तमाम संक्रामक रोगन से लड़ेके ताकत देला. एकरा नियमित सेवन से औरतन के गर्भाशय कैंसर के खतरा कम हो जाला.

ई तनाव दूर कऽके तन-मन में ताजगी भरि देला. बेगर चीनी के चाह चिनिया रोगियन (डाइबिटीज) खातिर लाभदायी होला. दिल के बेमारियो में ई हिफाजत करेला.आस्टियोपेरेसिस रोगो से ई मुकुती दियवावेला.

आजु सभसे सस्ता आ सभसे कारगर बा चाह. लोगन के दिल के एक-दोसरा से जोड़े में एकर भूमिका सरबविदित बा. तबे नू आजुकाल्ह चाहे पर चरचा चर्चित हो जात बा आ मन के बात के इजहार लोग चाहे पिअत-पिआवत कऽ देत बा. आईं, रउओं अपना आंतर के चाह बताईं, चाह पिआईं आ चाह बढ़ाईं, काहें कि जहवां चाह बा,उहंवें नू राह बा आ हरेक राह-बाट पर चाहे-चाह बा. (भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)





Source link

Leave a Reply

COVID-19 Tracker
%d bloggers like this: