Saturday, February 21

राजाओं की पसंद से विदेशी थालियों तक: किसानों के लिए मुनाफे का सौदा बना ‘मगही पान’

औरंगाबाद (बिहार): बिहार का मगही पान अब केवल राज्य तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विदेशी थालियों तक अपनी खास खुशबू और स्वाद के कारण पहुंच चुका है। राजाओं-महाराजाओं और नवाबों की महफिलों से लेकर आम घरों के पूजा-पाठ और त्योहारों तक इसकी जगह रही है। बिहार सरकार की पान विकास योजना और किसानों की मेहनत ने इसे किसानों के लिए लाभकारी व्यवसाय में बदल दिया है।

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मगही पान की खासियत और इतिहास

  • इसका नामकरण मगध क्षेत्र के आधार पर हुआ।

  • मुख्य रूप से मगध प्रमंडल में इसकी खेती होती है।

  • बिहार के लगभग 27 जिलों में इसकी खेती प्रचलित है, जिनमें औरंगाबाद, गया, नालंदा, मधुबनी, वैशाली, मुंगेर, भागलपुर, अररिया, पूर्णिया और जमुई प्रमुख हैं।

  • औरंगाबाद जिला इसका मुख्य केंद्र है, विशेष रूप से देव, मदनपुर और रफीगंज प्रखंड

किसानों के लिए क्यों लाभकारी

  • पान की खेती नकदी फसल है, जिससे कम जगह में अधिक मुनाफा।

  • इसकी पत्तियों की विशेष विधि और तीखा स्वाद इसे बाजार में अत्यधिक मांग वाला बनाते हैं।

  • खेती घर के अंदर, छत पर या छोटे खेतों में भी संभव है।

  • बिहार के औरंगाबाद जिले के खेमचंद बिगहा-केताकी गांव में लगभग 80 परिवार केवल पान के व्यवसाय पर निर्भर हैं।

वीरेन्द्र चौरसिया, किसान: “हमारी पीढ़ियों से यह खेती हमारी आजीविका का मुख्य आधार रही है। इसकी पत्तियाँ आसानी से मुंह में घुल जाती हैं और औषधीय गुणों से भरपूर हैं।”

मगही पान का वैश्विक कारोबार

  • बिहार के मगही पान की मांग केवल देश में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों में भी है।

  • दवा उद्योग में भी इसकी उपयोगिता बताई जाती है।

सरकार की मदद और सब्सिडी

  • जिला कृषि पदाधिकारी संदीप राज के अनुसार पान विकास योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण और 50% तक की सब्सिडी दी जाती है।

  • न्यूनतम 100 वर्ग मीटर और अधिकतम 300 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के लिए अनुदान राशि:

    • 100 वर्ग मीटर पर ₹11,750

    • 300 वर्ग मीटर पर ₹35,250

  • चालू वर्ष में 5,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में पान की खेती का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें से अब तक 4,000 वर्ग मीटर पर लक्ष्य हासिल हो चुका है।

निष्कर्ष

मगही पान ने बिहार के किसानों को आजीविका का मजबूत साधन और वैश्विक पहचान दोनों दी हैं। राज्य सरकार की पहल और किसानों की मेहनत से यह पारंपरिक कृषि उत्पाद अब देश-विदेश में किसानों के लिए लाभकारी व्यवसाय बन चुका है।

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