
छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में माओवादियों को मुख्यधारा में लौटाने के लिए एक अनोखी और बेहद भावुक पहल शुरू की है। जहां मोबाइल नेटवर्क तक काम नहीं करता, वहां अब आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) के जरिए सरकार उन जंगलों में परिवारों की आवाज पहुंचा रही है, जहां वर्षों से बंदूक की भाषा बोलने वालों की दुनिया बसती है।
इस मुहिम में नक्सलियों के परिजन अपने अपनों के लिए संदेश रिकॉर्ड करवा रहे हैं, जिन्हें रेडियो पर प्रसारित किया जा रहा है। उद्देश्य साफ है— हथियार छोड़ो, घर लौटो और नया जीवन शुरू करो।
बहन के नाम भाई की अपील ने झकझोरा
सुकमा जिले के निवासी अनिल कुरमी का एक संदेश इन दिनों रेडियो पर गूंज रहा है। यह संदेश उनकी बहन के लिए है, जो किशोरावस्था में घर छोड़कर माओवादी संगठन में शामिल हो गई थी और अब ‘क्रांति’ नाम से जानी जाती है।
भाई की आवाज रेडियो पर कुछ यूं सुनाई देती है—
“प्रिय बहन मासे… तुम किशोर अवस्था में घर छोड़कर पार्टी में शामिल हो गई थी। तब से मैंने तुम्हें नहीं देखा। मैं तुमसे हथियार डालने और घर लौटने की अपील करता हूं। हम सब तुम्हारी चिंता करते हैं।”
यह संदेश केवल एक परिवार की व्यथा नहीं, बल्कि उन सैकड़ों घरों की पीड़ा है, जिनके अपने वर्षों से जंगलों में गुम हैं।
जहां मोबाइल फेल, वहां रेडियो बना उम्मीद की किरण
बस्तर और आसपास के घने जंगलों में मोबाइल नेटवर्क लगभग न के बराबर है। ऐसे में सरकार ने रेडियो प्रसारण को माध्यम बनाया है, ताकि संदेश सीधे उन क्षेत्रों तक पहुंच सके, जहां नक्सली सक्रिय हैं।
अधिकारियों के अनुसार, आकाशवाणी दिन में दो बार माओवादी इलाकों में सिर्फ सरकारी घोषणाएं नहीं, बल्कि घर की आवाजें पहुंचा रही है। ये संदेश अधिकतर गोंडी भाषा में रिकॉर्ड किए गए हैं, ताकि वे सीधे स्थानीय कैडरों के दिल तक उतर सकें।
भतीजे की पुकार, चाचा से आत्मसमर्पण की अपील
अधिकारियों ने बताया कि प्रसारित संदेशों में कई भावनात्मक अपीलें शामिल हैं। एक संदेश में भतीजा अपने चाचा से कहता है कि वह अपने पोते-पोतियों और परिवार के भविष्य के लिए आत्मसमर्पण कर दे।
इन संदेशों में लगातार यही बात दोहराई जा रही है—
“सरकार पुनर्वास का लाभ दे रही है, सब लोग लौट रहे हैं… तुम भी वापस आ जाओ।”
केंद्र की समयसीमा के बीच तेज हुई कोशिश
केंद्र सरकार ने देश से वामपंथी उग्रवाद (LWE) समाप्त करने के लिए 31 मार्च की समयसीमा तय की है। इसी को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने माओवादियों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करने हेतु यह नई रणनीति अपनाई है।
यह पहल केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई नहीं, बल्कि भावनाओं के जरिए संवाद स्थापित करने की कोशिश मानी जा रही है।
इन राज्यों के रेडियो स्टेशनों से हो रहा प्रसारण
यह संदेश सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नक्सल प्रभावित कई राज्यों में प्रसारित किए जा रहे हैं। इनमें शामिल हैं—
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छत्तीसगढ़ (जगदलपुर, सरायपाली, रायपुर)
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तेलंगाना (कोठागुडेम)
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आंध्र प्रदेश (विशाखापत्तनम)
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महाराष्ट्र (चंद्रपुर, गढ़चिरौली)
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ओडिशा (भवनपटना, बोलंगीर)
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मध्य प्रदेश (बालाघाट, मंडला)
5 फरवरी से 25 फरवरी तक चलेंगे प्रसारण
अधिकारियों के मुताबिक, यह अभियान 5 फरवरी से शुरू हो चुका है और 25 फरवरी तक चलेगा। संदेशों का प्रसारण प्रतिदिन दो बार किया जा रहा है—
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सुबह 9 बजे से 10 बजे तक
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शाम 5 बजे से 6 बजे तक
इन समयों को इसलिए चुना गया है क्योंकि इस दौरान नक्सली कैडर अक्सर आराम या आपसी बैठक के लिए रुकते हैं और रेडियो सुनने की संभावना अधिक रहती है।
‘बंदूक नहीं, घर की आवाज असर करेगी’
सरकार की इस पहल को विशेषज्ञ नक्सल उन्मूलन की दिशा में एक अलग और मानवीय प्रयास मान रहे हैं। माना जा रहा है कि जब जंगलों में रेडियो पर कोई बहन, मां या भाई अपने प्रियजन को पुकारता है, तो वह आवाज पत्थर दिलों को भी पिघला सकती है।
यह मुहिम संदेश दे रही है कि जंगल में बंदूक के साथ जीवन नहीं, बल्कि घर लौटकर सम्मान और भविष्य संभव है।