
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने स्टार्टअप्स की परिभाषा में बड़ा बदलाव किया है। अब कंपनियां जिनका टर्नओवर 200 करोड़ रुपये तक है, उन्हें भी स्टार्टअप माना जाएगा। पहले यह सीमा 100 करोड़ रुपये थी। इसके साथ ही डीप टेक स्टार्टअप्स के लिए एक नई श्रेणी भी बनाई गई है, जो नई और रिसर्च-आधारित टेक्नोलॉजी पर काम करती हैं।
सरकार ने यह कदम भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम को नई दिशा देने के लिए उठाया है। लंबे समय और बड़े निवेश की मांग वाले क्षेत्रों जैसे डीप टेक, मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च-आधारित कंपनियों को अब ज्यादा समय और वित्तीय छूट मिलेगी। अब तक करीब दो लाख कंपनियों को स्टार्टअप के तौर पर मान्यता मिल चुकी है। इन कंपनियों को ‘स्टार्टअप इंडिया’ पहल के तहत इनकम टैक्स में छूट जैसे कई फायदे मिलते हैं।
नए नियमों के मुख्य बिंदु:
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कंपनियों को स्टार्टअप का दर्जा 10 साल की उम्र के बजाय अब 20 साल तक मिलेगा।
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डीप टेक स्टार्टअप्स की टर्नओवर सीमा 300 करोड़ रुपये तक बढ़ा दी गई है।
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नए नियम लंबे समय तक चलने वाले रिसर्च और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाली कंपनियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।
सहकारी समितियों को भी स्टार्टअप का दर्जा:
सरकार ने अब कुछ सहकारी समितियों (cooperative societies) को भी स्टार्टअप के रूप में मान्यता देने का फैसला किया है। इसका मकसद खेती, ग्रामीण उद्योग और समुदाय-आधारित व्यवसायों में नवाचार को बढ़ावा देना है।
इनमें शामिल हैं:
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मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, 2002 के तहत रजिस्टर हुई मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज।
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राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के कोऑपरेटिव एक्ट्स के तहत रजिस्टर हुई कोऑपरेटिव सोसाइटीज।
सरकार का तर्क:
पिछले दस सालों में स्टार्टअप इकोसिस्टम में बड़े बदलाव आए हैं। कई इनोवेशन पर आधारित कंपनियां अपनी उम्र या टर्नओवर की सीमा पार कर जाती हैं, भले ही वे अभी भी विकास या परीक्षण के दौर में हों। इसलिए टर्नओवर की सीमा 100 करोड़ से बढ़ाकर 200 करोड़ की गई है, ताकि स्टार्टअप्स को उनके बिजनेस के विभिन्न पड़ावों में विशेष लाभ और समर्थन मिल सके।